
शहबाज शरीफ व बलूचिस्तान चार्टर (डिजाइन फोटो)
Balochistan News: 8 फरवरी 2026 की तारीख पाकिस्तान के लिए भयावह और हलचल का उदाहरण बन सकती है। वर्षों से जिस खतरे ने इस्लामाबाद के सत्ता गलियारों में नींद उड़ा रखी थी वह अब हकीकत बनकर दुनिया के सामने आ खड़ा हुआ है। यह वही हकीकत है जिससे पाकिस्तान को कभी न कभी रूबरू होना पड़ेगा।
बलूचिस्तान के राष्ट्रवादियों ने अपना ‘अंतरिम संविधान’ जारी कर पाकिस्तान के नक्शे पर सीधे वार किया है। अब साफ है कि इस्लामाबाद के भीतर ही एक नया धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र उभर रहा है और पाकिस्तान का वजूद पहले जैसा मजबूता नहीं रहा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि अब पाक पीएम शहबाज शरीफ का अगला कदम क्या होगा?
बलूच नेता मीर यार बलूच द्वारा साझा किया गया यह दस्तावेज सिर्फ एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि पाकिस्तान की एकता को सीधी चुनौती माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस दस्तावेज ने रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सेना मुख्यालय में बैठे जनरल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की नींद उड़ा दी है। यह संविधान पाकिस्तान की नीतियों, सैन्य कार्रवाई और बलूचिस्तान में दशकों से जारी दमन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेनकाब करने का हथियार बन सकता है।
Patriots, congratulations to all of you.
✌✌⚖️⚖️📋💐 Balochistan’s constitution is published: Let’s initiate nationwide debate on Balochistan Liberation Charter By: Mir Yar Baloch
8th February 2026https://t.co/IBe3N9VIYM
@hyrbair_marri @baluchistan_lc The sixty million… pic.twitter.com/jj11OTyNHw — Mir Yar Baloch (@miryar_baloch) February 8, 2026
मीर यार बलूच ने इस ऐतिहासिक दस्तावेज को सोशल मीडिया के ज़रिए सार्वजनिक किया। देखते ही देखते यह बयान और चार्टर अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों, मानवाधिकार संगठनों और प्रवासी बलूच समुदाय के बीच चर्चा का विषय बन गया। पाकिस्तान के लिए यह स्थिति इसलिए भी खतरनाक मानी जा रही है क्योंकि अब यह मुद्दा केवल सीमा के भीतर नहीं, बल्कि वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन चुका है।
‘बलूचिस्तान लिबरेशन चार्टर’ की प्रस्तावना पाकिस्तान के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं है। मीर यार बलूच के मुताबिक, बलूचिस्तान की छह करोड़ माताओं, बहनों, बुज़ुर्गों और युवाओं ने आज़ादी के इस संघर्ष में अनगिनत कुर्बानियां दी हैं। चार्टर में दावा किया गया है कि यह संविधान उन लाखों शहीदों के खून से लिखा गया है, जिन्हें पाकिस्तानी सेना ने या तो गायब किया या फिर अमानवीय यातनाएं दीं।
चार्टर साफ शब्दों में कहता है कि बलूचिस्तान न तो पाकिस्तान का हिस्सा है और न ही किसी धार्मिक चरमपंथी विचारधारा का गढ़ है। यह एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनने की आकांक्षा रखता है, जहां सभी धर्मों, समुदायों और विचारों को समान अधिकार मिलेंगे। यह दस्तावेज आधुनिक संविधानिक मूल्यों, मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप एक नए राष्ट्र का ब्लूप्रिंट पेश करता है।
इस अंतरिम संविधान का श्रेय बलूच राष्ट्रवादी नेता ह्यर्ब्यार मर्री को दिया जा रहा है। समर्थक उन्हें आधुनिक बलूचिस्तान का ‘अंबेडकर’ और ‘शेख मुजीब-उर-रहमान’ कह रहे हैं। मर्री ने न सिर्फ बलूच आंदोलन को वैचारिक दिशा दी, बल्कि संघर्ष को हथियारों से आगे ले जाकर संविधान और विचारधारा की ज़मीन पर खड़ा करने वाला विजन भी पेश किया है।
ह्यर्ब्यार मर्री का यह प्रयास उनके पूर्वजों की उस विरासत को आगे बढ़ाता है, जिसने 18वीं सदी में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष किया था। बाद में यही संघर्ष पाकिस्तान के गठन के बाद भी जारी रहा। चार्टर में साफ कहा गया है कि बलूचों का संघर्ष किसी देश या धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व, संसाधनों और सम्मान के लिए है।
चार्टर का अरबी में अनुवाद कर अबू धाबी और खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों बलूचों के बीच बांटा गया है। अफगानिस्तान के साथ रिश्ते मजबूत करने के लिए इसे पश्तो और फारसी में भी अनुवादित किया गया। इसका सीधा संदेश है कि बलूच आंदोलन अब सिर्फ एक क्षेत्रीय विद्रोह नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की रणनीति बन चुका है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान के लिए बेहद असहज स्थिति पैदा कर सकता है। एक तरफ आर्थिक संकट, दूसरी ओर राजनीतिक अस्थिरता और अब बलूचिस्तान का अंतरिम संविधान इन सबने इस्लामाबाद की परेशानी बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि जब प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और जनरल आसिम मुनीर इस चार्टर के निहितार्थों को पूरी तरह समझेंगे, तो आने वाले दिनों में पाकिस्तान की राजनीति और सुरक्षा नीति पर इसका गहरा असर दिख सकता है।






