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दिगंबर जैन आचार्य सुनील सागर ने दिया वसुधैव कुटुंबकम का संदेश, कहा-भारत का डीएनए एक, मान्यताएं अलग
Digambar Jain Acharya Deep Thought On Indian Culture: दिगंबर जैन आचार्य सुनील सागर ने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय एकता और वर्तमान वैश्विक चुनौतियों पर एक गहरी बात कही है।
- Written By: गीतांजली शर्मा

दिगंबर जैन आचार्य सुनील सागर (फोटो सोर्स- सोशल मीडिया)
Digambar Jain Acharya: दिगंबर जैन आचार्य सुनील सागर ने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय एकता और वर्तमान वैश्विक चुनौतियों पर एक गहरा और विचारोत्तेजक बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारतवर्ष का मूल डीएनए एक है, भले ही पूजा पद्धतियां और मान्यताएं अलग-अलग हों। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की संस्कृति और व्यवस्थाएं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के वंश से जुड़ी हुई हैं, और यहां तक कि भगवान श्रीराम भी उसी वंश से आते हैं।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक डीएनए की एकता
आचार्य सुनील सागर ने भारतीय इतिहास और संस्कृति की जड़ों को गहराई से जोड़ा। उन्होंने कहा, “भारत की सारी संस्कृति ऋषभ देव के वंश की इच्छाओं से चालू होती है।” उन्होंने भगवान श्रीराम का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके पूर्वज भले ही रघु के नाम से रघुवंश कहलाए, लेकिन वे सभी ऋषभदेव के वंश से ही हैं। इस प्रकार, उनके अनुसार, भारत की सारी व्यवस्थाएं राजा-महाराजाओं द्वारा व्यवस्थित होती रहीं, जो इस बात को साबित करता है कि हमारे देश का डीएनए एक है।
आचार्य ने धार्मिक मतभेदों को परिवार के दो भाइयों के बीच की अलग-अलग मान्यताओं के समान बताया। उन्होंने कहा, “मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं। एक घर में दो भाइयों की मान्यताएं अलग-अलग होती हैं। यहां पर भी पूजा पद्धति को लेकर, देवताओं के आकार-प्रकार को लेकर मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं। बाकी हम सभी भारतवासी धरती के वासी हैं। हम सब का वसुधैव कुटुंबकम में विश्वास है।” उन्होंने कहा कि जो मूल रूप से भारतवासी हैं, उन्हें हम एक डीएनए वाला कह सकते हैं। यह बयान विविधता में एकता के भारतीय सिद्धांत को धार्मिक और ऐतिहासिक आधार पर मजबूती देता है।
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आत्मनिर्भरता और स्वदेशी पर जोर
आचार्य सुनील सागर ने अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ के मुद्दे पर भी अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने इस कदम को “तानाशाही और अनुचित” बताया। उनका मानना है कि इसका सबसे अच्छा जवाब स्वदेशी पर निर्भर रहना और अपने संसाधनों को महत्व देना है। उन्होंने कहा, “हमें उनके साथ व्यापार को यथासंभव सीमित रखने का प्रयास करना चाहिए।”
आचार्य ने आगे कहा, “जो धन देश के बाहर जा रहा है वह देश में ही खप जाए तो ज्यादा अच्छा है।” उन्होंने जोर दिया कि अमेरिका जैसे देशों को यह सबक सिखाना जरूरी है कि ऐसे कठोर कदम उठाने का क्या परिणाम होता है। यह बयान भारत की वर्तमान ‘आत्मनिर्भर भारत’ नीति और स्वदेशी आंदोलन के साथ भी मेल खाता है, जो देश को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने पर जोर देता है।
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आपसी सद्भावना और क्षमा का महत्व
अपने बयान में आचार्य ने आपसी सद्भावना और क्षमा के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “जब हम अव्यवस्थित होते हैं, आपस में लड़ते हैं, या अपने मूल सिद्धांतों का पालन नहीं करते, तो कोई भी आकर हम पर हमला कर सकता है।” उन्होंने सभी भारतीयों को अपने मूल मूल्यों के प्रति सच्चे रहते हुए सद्भावना से रहने की सलाह दी।
उन्होंने सभी धर्मों के मूल संदेश को संक्षेप में बताया: “क्षमा करें और क्षमा मांग लें, जीत है इसमें हार नहीं है…क्षमा वीर का आभूषण है, कायर का शृंगार नहीं है।”
यह संदेश वर्तमान समय में देश में बढ़ती हुई वैचारिक और राजनीतिक कलह के बीच आपसी भाईचारे और शांति को बढ़ावा देने की अपील करता है।
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