
Karna and Ekalavya (Source. Pinterest)
Injustice in The Mahabharat: महाभारत सिर्फ युद्ध और देवताओं की कहानी नहीं है, यह अन्याय, संघर्ष और इंसानी पीड़ा का आईना भी है। अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि महाभारत में सबसे ज्यादा अन्याय किस योद्धा के साथ हुआ कर्ण, एकलव्य या कोई और? यह सवाल उतना ही गहरा है जितना आज का आम आदमी, जो कई बार अपने जीवन में न्याय से वंचित रह जाता है।
कर्ण का जीवन अन्याय का प्रतीक माना जाता है। जन्म लेते ही मां ने त्याग दिया, पहचान उससे छिन गई। पूरी जिंदगी उसे “सूतपुत्” कहकर अपमानित किया गया। उसकी काबिलियत पर नहीं, उसकी जाति पर सवाल उठाए गए। अर्जुन के बराबर प्रतिभा होने के बावजूद उसे कभी समान दर्जा नहीं मिला।
हालांकि कर्ण को युद्ध का अवसर मिला। उसे अंग देश का राजा बनाया गया और जीवन के अंतिम दौर में सम्मान भी मिला, भले ही वह गलत पक्ष के साथ खड़ा था। कर्ण के साथ अन्याय हुआ, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन उसकी आवाज सुनी तो गई।
एकलव्य की कहानी ज्यादा शांत लेकिन ज्यादा पीड़ादायक है। बिना गुरु, बिना साधनों के, सिर्फ मेहनत और श्रद्धा से उसने खुद को महान धनुर्धर बनाया। लेकिन जब उसकी प्रतिभा सामने आई, तो इनाम नहीं, बल्कि “गुरुदक्षिणा” के नाम पर उसका अंगूठा काट लिया गया। उसका अपराध सिर्फ इतना था कि वह गलत कुल में पैदा हुआ और जरूरत से ज्यादा अच्छा बन गया। एकलव्य से उसका भविष्य छीन लिया गया बिना युद्ध, बिना गलती और बिना दूसरा मौका दिए।
महाभारत का सबसे गहरा अन्याय शायद उन योद्धाओं के साथ हुआ, जो सही जानते थे लेकिन चुप रहे। भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य जैसे लोग जानते थे कि क्या गलत है, फिर भी वचन, व्यवस्था और पद के कारण अन्याय के पक्ष में खड़े रहे। उन्होंने युद्ध तो लड़ा, लेकिन उनकी अंतरात्मा हार गई। कई बार अन्याय सहने से भी बड़ा अन्याय, अन्याय को होते देख चुप रहना होता है।
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अगर साफ कहा जाए तो कर्ण के साथ समाज ने अन्याय किया। एकलव्य के साथ व्यवस्था ने अन्याय किया। और कई योद्धाओं ने खुद अपने आप से अन्याय किया। महाभारत हमें सिखाता है कि अन्याय सिर्फ सहना ही नहीं, उसे स्वीकार करना और चुप रहना भी उतना ही खतरनाक है। शायद यही वजह है कि यह महाकाव्य आज भी जिंदा है, क्योंकि इसके सवाल आज भी हमारे अपने सवाल हैं।






