
दान करना(सौ.सोशल मीडिया)
Daan Ke Niyam: हिन्दू धर्म में दान करना पुण्य का काम माना गया है और यह कहा गया है कि दान का भाव आपमें एक बेहतर व्यक्तित्व विकसित करता है। ऋग्वेद के अनुसार, दान करना किसी यज्ञ करने के बराबर है और यज्ञ करने के बाद जिस फल की प्राप्ति होती है, वही फल किसी को दान करने से भी मिलता है।
हिंदू धार्मिक ग्रंथों में भी दान का विशेष महत्व बताया गया है लेकिन साथ में कुछ नियम भी बताये गए हैं। उन्हीं नियमों में इस बात की भी व्याख्या है कि आपको अपनी कमाई का कितना प्रतिशत हिस्सा जरूर दान करना चाहिए।
धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि हर व्यक्ति को अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा दान के लिए रखना चाहिए। शास्त्रों में इसे दशांश दान कहा गया है, यानी अपनी आय का 10 प्रतिशत भाग दान करना सबसे उत्तम माना जाता है।
शास्त्रों की मानें, तो हर व्यक्ति को अपनी समर्थता और परिस्थिति के अनुसार दान करना चाहिए। यदि किसी की आय अधिक है और वह अधिक दान करने में सक्षम है, तो उसे अधिक दान करना चाहिए। दान से समाज में संतुलन और समृद्धि बनी रहती है।
भगवद गीता में दान को तीन प्रकारों में विभाजित किया गया है। पहला दान है सात्विक दान, जो बिना किसी अपेक्षा के और सही स्थान और समय पर किया जाता है।
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दूसरा दान है राजसिक दान, जो फल की अपेक्षा के साथ और किसी अन्य स्वार्थ के लिए किया जाता है।
तीसरा है तामसिक दान, जो अनुचित स्थान, समय और व्यक्ति को किया जाता है। दान हमेशा सत्पात्र अर्थात् दान लेने हेतु योग्य व्यक्ति को ही दिया जाना चाहिए और ऋण लेकर कभी भी दान नहीं दिया जाना चाहिए।
दान कभी भी अपनों को दुखी या प्रताड़ित करके भी नहीं दिया जाना चाहिए। दान को लेकर यह भी कहा जाता है कि अपने संकट काल के लिए संरक्षित धन यानि सेविंग का कभी भी दान नहीं दिया जाना चाहिए।






