इंद्रियों पर काबू पा लिया तो जीवन बदल जाएगा, श्री प्रेमानंद जी महाराज का सीधा और कठोर संदेश

Shri Premanand Ji Maharaj कहते हैं कि जिसने अपने हृदय में दिव्य युगल का आश्रय ले लिया, उसके लिए जीवन का एक ही संकल्प होना चाहिए "नन्याम बादामी", यानी मैं उनके अलावा कुछ नहीं बोलूंगा।
gain control over your senses, your life will change direct and firm message from Shri Premanand Ji Maharaj.
Shri Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
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Control of The Senses: श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि जिसने अपने हृदय में दिव्य युगल का आश्रय ले लिया, उसके लिए जीवन का एक ही संकल्प होना चाहिए "नन्याम बादामी", यानी मैं उनके अलावा कुछ नहीं बोलूंगा। उनके अनुसार, एक साधक को केवल प्रिय-प्रितम की महिमा, नाम, धाम और रसिक संतों की संगति की ही चर्चा करनी चाहिए। यदि जीभ ईश्वर से इतर विषयों में लिप्त रहती है, तो बाकी इंद्रियों को वश में करना असंभव हो जाता है। जब वाणी अशुद्ध होती है, तो स्वाद भी अपवित्र हो जाता है और अंततः कामेंद्रिय मनुष्य को अपना गुलाम बना लेती है, जिससे पतन निश्चित हो जाता है।

आत्मा के द्वार हैं इंद्रियां, इन्हें संभालना सीखो

इंद्रियां वे द्वार हैं, जिनसे संसार भीतर प्रवेश करता है। इसलिए इनकी रक्षा अत्यंत आवश्यक है।

  • श्रवण की शक्ति: हम जो सुनते हैं, वही सोचते हैं और वही करते हैं। निंदा, कटु वचन और भौतिक गीत मन को नीचे खींचते हैं। जहां ईश्वर चर्चा न हो, वहां से तुरंत हट जाना चाहिए, नहीं तो साधना बाधित हो जाती है।
  • दृष्टि और चरणों की पवित्रता: "नन्यात ब्रजमी" मेरे कदम कहीं और न जाएं। नशा, वासना और अनैतिकता की ओर बढ़े कदम मनुष्य को ऐसे दलदल में फंसा देते हैं, जहां से निकलना कठिन हो जाता है।
  • चिंतन की शुद्धता: जाग्रत अवस्था का चिंतन ही सपनों का निर्माण करता है। यदि स्वप्न अशुद्ध हों, तो समझ लेना चाहिए कि दिन में विचार या कर्म दूषित हैं। सच्चे भक्त के सपनों में केवल ईश्वर या उनके संकेत ही आते हैं।

धाम की महिमा और एकनिष्ठ आश्रय

श्री प्रेमानंद जी महाराज निष्ठा की शक्ति पर जोर देते हैं। उनका कहना है कि वृंदावन धाम में रहकर उन्होंने ऐसे चमत्कार देखे हैं, जो चिकित्सा विज्ञान से परे हैं। केवल "राधा राधा" नाम जप और धाम के आश्रय से असाध्य रोग तक मिटते देखे गए हैं। समस्या यह है कि हमारा आश्रय बंटा हुआ है कभी पैसा, कभी पद, कभी रिश्ते। सच्चा आश्रय वही है, जहां सुख-दुख दोनों में प्रभु को ही कर्ता माना जाए।

भक्ति का फल: दिव्य अश्रु

भक्ति का अंतिम फल सांसारिक लाभ नहीं, बल्कि वह प्रेम है जो आंखों से बहने लगता है। वृक्ष के नीचे बैठकर "राधा राधा" कहते हुए धरती को अपने आंसुओं से भिगो देना यही सच्ची पूजा है। भगवान उन्हीं को प्रकट होते हैं, जो उनके लिए रोते हैं। नाम ही कल्पवृक्ष है, जो इस लोक और परलोक दोनों का कल्याण करता है।