
Angad (Source. Pinterest)
Angad Strength: रामायण के युद्ध से पहले का एक प्रसंग आज भी लोगों को हैरान करता है अंगद का पैर, जिसे लंका का कोई भी योद्धा उठा नहीं सका। आखिर अंगद के पैर में ऐसा क्या था? क्या यह सिर्फ बल की बात थी या इसके पीछे कोई गहरा संदेश छिपा है?
यह दृश्य उस समय का है जब भगवान राम की सेना लंका के द्वार तक पहुंच चुकी थी। सेतु बन चुका था और वानर सेना समुद्र पार कर चुकी थी। ऐसे समय में जब युद्ध तय लग रहा था, तब भी भगवान राम ने शांति का मार्ग चुना। उन्होंने रावण को उसके पापों पर पश्चाताप का एक अंतिम अवसर देना चाहा। यही कारण था कि युद्ध से पहले एक दूत को लंका भेजने का निर्णय लिया गया।
सबकी पहली सोच थी कि हनुमान जी को भेजा जाए, क्योंकि वे पहले भी लंका जा चुके थे और शक्ति व बुद्धि में अद्वितीय थे। लेकिन भगवान राम ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि यदि हनुमान को भेजा गया, तो शत्रु यही सोचेगा कि राम की सेना में सिर्फ वही एक महान योद्धा हैं। इसलिए उन्होंने अंगद को दूत बनाने का निर्णय लिया।
एक राजदूत को चतुर, विनम्र, निडर, वफादार और अपने गुरु के प्रति समर्पित होना चाहिए। साथ ही वह व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर संदेश पहुंचाने में सक्षम होना चाहिए। अंगद इन सभी गुणों पर खरे उतरते थे। वे शक्तिशाली थे, लेकिन अहंकारी नहीं। निडर थे, लेकिन मर्यादित भी।
अंगद को चुनकर भगवान राम ने दो उद्देश्य पूरे किए। पहला, उन्होंने यह दिखाया कि अंगद किष्किंधा के भावी राजा बनने के योग्य हैं। दूसरा, उनकी भक्ति और निष्ठा की परीक्षा ली। रावण ने वाली से पुरानी मित्रता का हवाला देकर अंगद को अपने पक्ष में करने की कोशिश की, लेकिन अंगद ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया। यहीं उन्होंने प्रभु की परीक्षा पास की।
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जब अंगद ने सभा में अपना पैर जमीन पर जमा दिया और चुनौती दी कि जो इसे हिला दे वही योग्य है, तब पूरी लंका असफल हो गई। यह सिर्फ शारीरिक शक्ति नहीं थी।
यह प्रभु श्री राम की भक्ति का प्रताप था, जिसने अंगद को ऐसा दृढ़ निश्चय दिया कि वह पूरी लंका को चुनौती दे सके।
ईश्वर जो भी करते हैं, उसके पीछे गहरा अर्थ होता है। अंगद का प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची शक्ति भक्ति, निष्ठा और धर्म से आती है। अगर हम जागरूक रहें, तो हर घटना हमें कुछ नया सिखा सकती है।






