
आरपीएफ की गुंडागर्दी (AI Generated Photo)
Railway Passenger Safety: भारतीय रेल में रेलवे सुरक्षा बल यानी आरपीएफ का गठन यात्रियों की सुरक्षा, विश्वास और संवेदनशील परिस्थितियों में मानवीय सहायता के उद्देश्य से किया गया है लेकिन आगरा स्टेशन पर नागपुर के यात्रियों पर चेन पुलिंग का झूठा आरोप लगाकर 7,000 रुपये की लूट की घटना बताती है कि खाकी वर्दी के भीतर छिपी कुछ मानसिकताएं अब सुरक्षा नहीं बल्कि भय का पर्याय बनती जा रही हैं। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो अपराध केवल व्यक्ति विशेष का नहीं, पूरी व्यवस्था की साख पर हमला होता है।
इस प्रकरण में आरपीएफ कर्मियों द्वारा जिस तरह यात्रियों, विशेषकर महिला और डेढ़-डेढ़ वर्ष के मासूम बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया, वह किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार करने के लिए पर्याप्त है। बिना जांच, बिना प्रमाण और बिना संवेदना के यात्रियों पर झूठा आरोप थोपना, गर्दन दबाना, महिला को बच्चे सहित घसीटना, यह सब कानून की रक्षा नहीं बल्कि कानून की हत्या है। यह आचरण बताता है कि कुछ कर्मियों के लिए वर्दी सेवा का प्रतीक नहीं, सत्ता के दुरुपयोग का हथियार बन चुकी है।
ऐसी घटनाएं आरपीएफ और रेलवे की छवि को यात्रियों के मन में गहरी चोट पहुंचाती हैं। जिस बल पर यात्री संकट की घड़ी में भरोसा करते हैं वही जब डराने, धमकाने और लूटने लगे तो आम नागरिक का भरोसा टूटना स्वाभाविक है। एक बार टूटा विश्वास केवल माफी या प्रेस विज्ञप्ति से वापस नहीं आता। हर ऐसी घटना हजारों ईमानदार कर्मियों की छवि को भी धूमिल करती है जो वास्तव में कर्तव्यनिष्ठ हैं।
यह मामला विभाग में आपराधिक सोच वाले सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी की झलक भी देता है। चेन पुलिंग करने वाले अज्ञात युवक की भूमिका, आरपीएफ कर्मियों की असाधारण तत्परता, वीडियो बनाने से रोकने की धमकी और खाली रसीद पर हस्ताक्षर, ये सब संकेत देते हैं कि यह केवल ‘दुर्व्यवहार’ नहीं बल्कि संगठित उगाही जैसा अपराध है। सवाल यह भी है कि क्या ऐसे तत्व वर्षों से सिस्टम के भीतर पल-बढ़ रहे हैं?
सबसे चिंताजनक पहलू दिल्ली स्थित आरपीएफ हेडक्वार्टर और सतर्कता (भ्रष्टाचार निरोधक) तंत्र की चुप्पी है। हेल्प लाइन नंबर 139 पर की गई शिकायत को बिना पुष्टि के बंद कर देना दर्शाता है कि शिकायत निवारण तंत्र यात्रियों के लिए नहीं, आंकड़ों को सुंदर बनाने के लिए चल रहा है। जब ऊपर से सख्त निगरानी नहीं होगी तो नीचे जवाबदेही कैसे आएगी?
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बेहतर होगा कि हेडक्वार्टर ऐसे मामलों में सघन जांच करके दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दें, साथ ही इस कार्यवाही को सार्वजनिक करें ताकि आरपीएफ कर्मियों द्वारा यात्रियों से ऐसा दुर्व्यवहार ना हो और यात्रियों के मन में विभाग के प्रति पारदर्शिता वाली छवि का निर्माण हो।
ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस उपाय आवश्यक हैं जैसे आरपीएफ कर्मियों के लिए बॉडी कैमरा अनिवार्य हो। हर पेनल्टी डिजिटल और ट्रेसेबल हो। शिकायतों की स्वतंत्र जांच हो और दोषियों पर त्वरित व सार्वजनिक कार्रवाई हो। साथ ही इस कार्यवाही के परिणाम की पीड़ित रेल यात्री को सूचना भी जाये, ताकि उसके मन में रेलवे और आरपीएफ के प्रति दर्दनाक अनुभव के स्थान पर विश्वास का घर बने।
संवेदनशीलता और मानवाधिकारों पर नियमित प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए। आरपीएफ को यह समझना होगा कि पीड़ित यात्री कोई ‘फाइल’ नहीं बल्कि इंसान हैं। उनके प्रति सहानुभूति, सम्मान और न्याय का भाव रखना कोई एहसान नहीं बल्कि संवैधानिक और नैतिक दायित्व है। यदि खाकी अपनी आत्मा नहीं बचा पाई तो वर्दी का रंग ही नहीं, उसका अर्थ भी मिट जाएगा।






