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सबरीमाला मामले में केंद्र का हलफनामा, सुप्रीम कोर्ट में कहा- जज नहीं कर सकते धर्म की व्याख्या
- Written By: अर्पित शुक्ला
Sabarimala Case: सबरीमला मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया। सरकार ने कहा कि धार्मिक परंपराओं को आधुनिकता के तराजू पर तौलना न्यायिक अतिक्रमण होगा।

सुप्रीम कोर्ट(सोर्स- सोशल मीडिया)
Sabarimala Case in Supreme Court: सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने वाले 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दायर पुनर्विचार याचिकाओं को लेकर केंद्र सरकार ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है। आज होने वाली सुनवाई(Sabarimala Case) से पहले केंद्र ने अदालत में विस्तृत लिखित दलीलें दाखिल करते हुए इन याचिकाओं का समर्थन किया है।
केंद्र सरकार का कहना है कि यह मामला केवल लैंगिक समानता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक आस्था, परंपराओं और संप्रदाय की स्वायत्तता से भी जुड़ा हुआ है। तुषार मेहता के माध्यम से दाखिल हलफनामे में सरकार ने अदालत को आगाह किया कि धार्मिक परंपराओं को ‘तर्कसंगतता, आधुनिकता या वैज्ञानिकता’ के आधार पर परखना न्यायिक अतिक्रमण होगा।
अदालतों को धर्म की व्याख्या करने से बचना चाहिए
सरकार ने यह भी कहा कि अदालतों को धर्म की व्याख्या करने से बचना चाहिए। यदि न्यायपालिका धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा इन मानकों पर करती है, तो वह अपने दार्शनिक विचारों को धर्म पर थोपने जैसी स्थिति पैदा कर सकती है, जो संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है। दलीलों में यह भी कहा गया कि न्यायाधीश न तो धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने के लिए प्रशिक्षित हैं और न ही संस्थागत रूप से इसके लिए उपयुक्त हैं।
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केंद्र ने “Essential Religious Practice” (आवश्यक धार्मिक प्रथा) के सिद्धांत पर भी सवाल उठाए। उसका कहना है कि किसी प्रथा की अनिवार्यता तय करने का अधिकार अदालत के बजाय संबंधित धार्मिक संप्रदाय के पास होना चाहिए। अदालत को केवल तब हस्तक्षेप करना चाहिए जब कोई प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे।
ये भेदभाव नहीं परंपरा का हिस्सा
सरकार ने तर्क दिया कि सबरीमाला(Sabarimala Case) में भगवान अयप्पा की पूजा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ के रूप में होती है और 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ा है। इसे भेदभाव नहीं, बल्कि परंपरा का हिस्सा बताया गया है।
हलफनामे में यह भी कहा गया कि देवता की ‘ज्यूरिस्टिक पर्सनैलिटी’ को मान्यता प्राप्त है, इसलिए संप्रदाय की व्याख्या को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि अदालतें ‘आवश्यक’ और ‘गैर-आवश्यक’ प्रथाओं में विभाजन करती हैं, तो इससे श्रद्धालुओं की आस्था प्रभावित हो सकती है।
2018 के फैसले की आलोचना
केंद्र सरकार ने 2018 के फैसले(Sabarimala Case) की आलोचना करते हुए कहा कि उस निर्णय में अदालत ने भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य स्वरूप की आवश्यकता की जांच की, जिससे वह धार्मिक विवादों में एक तरह से थियोलॉजिकल निर्णायक बन गई।
साथ ही, ‘संवैधानिक नैतिकता’ की अवधारणा को भी केंद्र ने अस्पष्ट बताया और कहा कि इसका संविधान में स्पष्ट आधार नहीं है। सरकार का तर्क है कि इस अवधारणा के जरिए न्यायपालिका धार्मिक परंपराओं में बदलाव कर सकती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से संविधान संशोधन जैसा है।
यह भी पढ़ें- NCERT विवाद: ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ लिखने वाले 3 विशेषज्ञों ने खटखटाया SC का दरवाजा, जानें क्या दी दलील
केंद्र के अनुसार, सबरीमाला विवाद अब केवल मंदिर में प्रवेश का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा की सीमाओं, ‘Essential Religious Practice’ और ‘Constitutional Morality’ जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर व्यापक बहस का विषय बन चुका है।
Sabarimala case supreme court center affidavit essential religious practice constitutional morality
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