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NCERT की किताबों से अब गायब होंगे कार्टून? सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी के बाद छिड़ा बड़ा संग्राम
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
Supreme Court ने एनसीईआरटी की किताबों में कार्टूनों के इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित की है। अदालत का मानना है कि स्कूली किताबें व्यंग्य के लिए उपयुक्त स्थान नहीं हैं।

फोटो- AI
NCERT Textbook Controversy: शुक्रवार को देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसी टिप्पणी की है, जिसने शिक्षा जगत और बुद्धिजीवियों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि NCERT की किताबें कार्टूनों के लिए सही जगह नहीं हैं। यह मामला केवल तस्वीरों के होने या न होने का नहीं है, बल्कि यह उस गंभीर सवाल से जुड़ा है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को लोकतंत्र और संस्थाओं के बारे में किस नजरिए से पढ़ा रहे हैं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के सामने तर्क दिया कि सामान्य तौर पर कार्टूनों से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन जब बात स्कूली पाठ्यपुस्तकों की आती है, तो स्थिति बदल जाती है। उनका कहना था कि ये किताबें उन बच्चों द्वारा पढ़ी जाती हैं जो ‘प्रभावशाली उम्र’ में होते हैं और उनका दिमाग किसी भी बात को बहुत जल्दी ग्रहण कर लेता है।
तुषार मेहता ने क्या कहा?
तुषार मेहता ने सीधे शब्दों में कहा कि “पाठ्यपुस्तक वह जगह नहीं है जहां आप कार्टूनों का इस्तेमाल करें।” उन्होंने एक बड़ा सवाल खड़ा किया कि क्या व्यंग्य और उपहास को स्कूली शिक्षण सामग्री का हिस्सा होना चाहिए, क्योंकि इससे बच्चों के मन में संस्थाओं के प्रति गलत धारणा बन सकती है।
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जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में बनी कमेटी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने सरकार की इस चिंता को गंभीरता से लिया है। अदालत ने आदेश दिया है कि एनसीईआरटी की किताबों में मौजूद कार्टूनों की शुचिता और उनके प्रभाव की जांच की जानी चाहिए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज, जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में एक विशेष कमेटी का गठन किया गया है।
यह कमेटी अब उन सभी सामग्रियों की समीक्षा करेगी जिन पर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, अतीत में इसी अदालत ने ‘व्यंग्य की कला’ का समर्थन करते हुए कहा था कि इसे किसी अति-संवेदनशील व्यक्ति के नजरिए से नहीं परखा जाना चाहिए, लेकिन बच्चों की शिक्षा के मामले में अब अदालत ने एक अधिक सतर्क रुख अपनाया है।
कहां से शुरु हुआ विवाद
इस पूरे विवाद की जड़ें कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ से जुड़ी हैं। इस किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर एक अध्याय शामिल किया गया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। अदालत का मानना था कि ऐसी सामग्री न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाती है।
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इसी मामले में पहले तीन शिक्षाविदों- प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की गई थी और संस्थानों को उनसे अलग होने को कहा गया था। हालांकि, शुक्रवार को अदालत ने अपने आदेश में संशोधन करते हुए उन पर लगाए गए प्रतिबंध हटा लिए हैं और उनके स्पष्टीकरण को स्वीकार कर लिया है।
एनसीईआरटी ने भी इस पूरे प्रकरण पर माफी मांगते हुए इसे निर्णय की अनजाने में हुई गलती बताया है और विवादित सामग्री को वापस ले लिया है। अब सबकी नजरें जस्टिस इंदु मल्होत्रा कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि भविष्य में हमारे बच्चों की किताबों में व्यंग्य के लिए कोई जगह होगी या नहीं।
Ncert textbook cartoons supreme court justice indu malhotra review committee
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