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Pope Leo का ट्रंप पर निशाना: ‘राजनीतिक लक्ष्यों के लिए सैन्य बल का इस्तेमाल गलत’
Military force criticism: पोप लियो ने ट्रंप की नीतियों पर कहा कि राजनीतिक मकसद के लिए सैन्य बल का प्रयोग गलत है। उन्होंने वेनेजुएला संकट पर चिंता जताते हुए मानवाधिकारों की रक्षा की अपील की है।
- Written By: प्रिया सिंह

पोप लियो XIV (सोर्स-सोशल मीडिया)
Pope Leo speech on Trump Venezuela: वेटिकन सिटी के नवनियुक्त पोप लियो ने अपने पहले आधिकारिक वार्षिक संबोधन में वैश्विक राजनीति और संघर्षों पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम लिए बिना वेनेजुएला जैसे देशों में सैन्य हस्तक्षेप और ताकत के बढ़ते उपयोग की तीखी आलोचना की। पोप ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों की कमजोरी पर चिंता जताते हुए कहा कि अब बातचीत की जगह युद्ध का जुनून हावी होता जा रहा है। मई में कार्यभार संभालने वाले अमेरिकी मूल के इस पोप के भाषण के दौरान अमेरिका और वेनेजुएला दोनों के राजदूत वहां मौजूद थे।
ताकत की कूटनीति पर चिंता
वेटिकन में 184 राजदूतों को संबोधित करते हुए पोप लियो ने कहा कि वर्तमान विश्व में संवाद और सहमति बनाने वाली पारंपरिक कूटनीति अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। उन्होंने अफसोस जताया कि अब बातचीत की मेज के बजाय सैन्य शक्ति पर आधारित नीतियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलन में वापस आ रही हैं। पोप ने चेतावनी दी कि युद्ध को बढ़ावा देने वाली सोच वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती जा रही है।
वेनेजुएला और मानवाधिकारों का मुद्दा
पोप लियो ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और वहां के राजनीतिक हालातों का उल्लेख करते हुए सभी पक्षों से जनता की इच्छा का सम्मान करने को कहा। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी सरकार को वेनेजुएला के लोगों के नागरिक और मानवाधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनका इशारा स्पष्ट था कि सत्ता परिवर्तन के लिए बाहरी सैन्य हस्तक्षेप के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और मानवीय अधिकारों का पालन किया जाना चाहिए।
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पोप लियो की वैचारिक पृष्ठभूमि
रॉबर्ट प्रेवोस्ट के नाम से मशहूर पोप लियो अमेरिकी मूल के पहले पोप हैं जिन्होंने दशकों तक पेरू में एक मिशनरी के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। पिछले साल पोप फ्रांसिस के निधन के बाद उन्हें इस सर्वोच्च धार्मिक पद के लिए चुना गया था, जिससे वे दक्षिण अमेरिकी संघर्षों के प्रति संवेदनशील हैं। यद्यपि वे स्वयं अमेरिकी हैं, फिर भी उन्होंने ट्रंप प्रशासन की ‘अमेरिका फर्स्ट’ और आक्रामक विदेश नीति के प्रति अपनी असहमति स्पष्ट रूप से व्यक्त की है।
43 मिनट का व्यापक संबोधन
अपने विस्तृत भाषण में पोप लियो ने केवल युद्ध ही नहीं, बल्कि गर्भपात, इच्छामृत्यु और सरोगेसी जैसे नैतिक विषयों पर भी कैथोलिक चर्च के रूढ़िवादी विचारों को दोहराया। उन्होंने पश्चिमी देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिकुड़ने और ईसाइयों के खिलाफ बढ़ते धार्मिक भेदभाव पर भी अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी। पोप ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे अंतरराष्ट्रीय संगठनों को मजबूत करें ताकि वैश्विक संघर्षों का शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सके।
यह भी पढ़ें: ‘ऐक्शन के लिए तैयार रहिए’, रजा पहलवी ने ट्रंप से की अपील, कहा- ईरान में गोलियों का सामना कर रहे हैं लोग
लोकतंत्र और ईसाई मूल्यों की रक्षा
भाषण के अंत में पोप ने यूरोप और अमेरिका में ईसाइयों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता की आलोचना करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पश्चिमी समाजों को अपने बुनियादी मूल्यों और अभिव्यक्ति की आजादी को बचाने के लिए कड़े प्रयास करने की जरूरत है। पोप लियो का यह भाषण संकेत देता है कि उनके नेतृत्व में वेटिकन वैश्विक राजनीति में अधिक सक्रिय और मुखर भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
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