
क्या असम में भी औपचारिक चुनाव ? (सौ.,डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: मौजूदा जनतंत्र में वोट से माया से सीधा नाता. 2014 से स्थापित है. मप्र में लाडली लक्ष्मी का उदय. माया रूपी लक्ष्मी. शिवराज ‘मामा’ ने बच्चियों तक माया पहुंचाई। 2014 के चुनाव में सत्ता पाई. माया का जादू चल पड़ा। बिहार के बाद अब असम में भी चलने वाला है. बिहार में चुनाव से पहले 10,000 रुपये दिए गए, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना था। अब असम में भी 8000 रुपये देने की तैयारी है. रणनीति तैयार है, ऐलान बाकी है। जाहिर है, बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया. एक नंबर में वोटर तक पैसा पहुंचेगा तो धोखे का सवाल ही नहीं. सवाल यह है क्या वास्तव में माया से सत्ता साश्वत सत्य साबित हो गया है।
क्या जनता की जरूरत सिर्फ पैसे तक सीमित हो गई है. क्या नैतिक जिम्मेदारी का भाव खत्म हो गया है. शायद नहीं.. लेकिन मायने बदल गए हैं. नैतिक जिम्मेदारी अब परिवार तक सीमित हो गई. परिवार चाहे आम व्यक्ति का हो या देश के प्रधानमंत्री का। एक खुले मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना परिवार देश की 150 करोड़ जनता को बताया और विपक्ष का परिवार एक मां और दो बच्चों वाला बताया. उन्होंने इतिहास भी बताया और भविष्य की तस्वीर भी दिखाई. शायद सच थे.. क्योंकि 150 करोड़ की आबादी वाले इस देश में तकरीबन 60 करोड़ युवा आबादी बेरोजगार है. उसे आत्मनिर्भर बनाना सरकार का नैतिक दायित्व है।
योजना के जरिए उसके खाते में सीधे पैसा डालना एक तरीका है. वह कभी भी जमा किया जा सकता है. चुनाव के पहले और बाद में भी. विपक्ष या सत्ता विरोधी इसे भले वोट खरीदी कहे. पैसा तो एक नंबर में दिया जा रहा है. यह तो लेने वाले की ईमानदारी है कि वह चुनाव में वोट किसे देता है. पैसा देने वाले को या फिर मुद्दों पर गला फाड़ने वालों को. क्योंकि चुनाव कराने वाली संस्था भारत निर्वाचन आयोग तो अपने कानून से चलता है। वह अप्रैल 2017 में तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता के निधन के कारण चेन्नई की आरके नगर विधानसभा सीट का उपचुनाव इसलिए स्थगित कर देता है क्योंकि मतदाताओं को बड़े पैमाने पर धन, उपहार, और अन्य प्रलोभनों के जरिए प्रभावित किए जाने की उसे सूचना मिलती है। बिहार में विधानसभा चुनाव की आचार संहिता 6 अक्टूबर को लागू हुई।
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इससे महज 10 दिन पहले 26 सितंबर को महिलाओं के खाते में 10,000 रुपए डीबीटी करने वाली महिला रोजगार योजना शुरू की गई. 12,500 करोड़ रुपए की एक बड़ी राशि ट्रांसफर भी कर दी गई. विपक्ष ने ढेरों शिकायतें कीं लेकिन निर्वाचन आयोग को इसमें कहीं मतदाता का प्रलोभन नहीं नजर आया. चुनाव हुए और परिणाम भी आए. महज 7 साल के अंतराल में चुनाव आयोग की अप्रोच के दो चेहरे दिखते हैं. संभव है यही चेहरा असम भी देखने को मिले. लेकिन, अगर ऐसे चुनावों के दौरान खातों में सीधे रुपए डालकर ही चुनाव जीतना है तो चुनाव की क्या आवश्यकता है. जब चुनावी नतीजे जनता की पसंद की बजाय सरकारी मशीनरी तय करे यानी लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह जाए.
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा






