
Shourya Sports Meet:वर्धा के गांधी सिटी पब्लिक स्कूल (सोर्सः सोशल मीडिया)
Wardha Sports Festival: खेल केवल शारीरिक तंदुरुस्ती का साधन ही नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक विकास और चरित्र निर्माण का प्रभावी माध्यम भी हैं। आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में बच्चों को केवल पढ़ाई तक सीमित रखना उचित नहीं है। खेलों के माध्यम से संघर्षशीलता, अनुशासन और नेतृत्व जैसे गुण विकसित होते हैं। इससे बच्चों की एकाग्रता, निर्णय क्षमता और नैतिक मूल्यों का विकास होता है। नियमित रूप से खेल खेलने वाले बच्चों में तनाव कम होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है। खेल वास्तव में चरित्र निर्माण का गुरुकुल हैं।
उक्त विचार शंकरप्रसाद अग्निहोत्री ने व्यक्त किए। वे जय महाकाली शिक्षण संस्था द्वारा संचालित गांधी सिटी पब्लिक स्कूल, नाचनगांव (पुलगांव) में आयोजित वार्षिक क्रीड़ा महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे। नाचनगांव स्थित गांधी सिटी पब्लिक स्कूल में वार्षिक क्रीड़ा महोत्सव ‘शौर्य स्पोर्ट्स मीट’ का भव्य आयोजन किया गया।
इस क्रीड़ा महोत्सव का उद्घाटन विद्यालय के प्रधानाचार्य धनंजय शिंगनजुड़े ने किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि शंकरप्रसाद अग्निहोत्री तथा विशेष अतिथि के रूप में पवन साहू, दिलीप अग्रवाल, श्रवण मंडले और अभिजित सूर्यवंशी उपस्थित थे। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने मार्च पास्ट, विविध सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और क्रीड़ा प्रात्यक्षिक प्रस्तुत किए। इस महोत्सव में प्री-प्राइमरी, प्राइमरी और सेकेंडरी विभाग के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
क्रीड़ा महोत्सव के अंतर्गत खो-खो, कबड्डी, क्रिकेट, फुटबॉल, 100 मीटर दौड़, बॉल रेस, रस्साकशी सहित विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। विद्यालय के विभिन्न हाउस के विद्यार्थियों ने अनुशासन और खेल भावना के साथ प्रतियोगिताओं में भाग लेकर महोत्सव को सफल बनाया।
क्रीड़ा स्पर्धाओं का नियोजन एवं आयोजन क्रीड़ा शिक्षक पवन डोले और स्मिता बनसोड ने किया। कार्यक्रम का संचालन सचिन उमप ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन स्विटी गहलोत ने किया। क्रीड़ा महोत्सव के सफल आयोजन हेतु विद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी एवं आयोजन समिति के योगदान की सराहना की गई। यह क्रीड़ा महोत्सव उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।
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खेल न केवल शरीर को स्वस्थ रखते हैं, बल्कि मानसिक विकास, चरित्र निर्माण और सामाजिक गुणों को भी सशक्त बनाते हैं। आज के तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धात्मक दौर में खेलों का महत्व और अधिक बढ़ गया है। बचपन में खेल बच्चों की स्वाभाविक आवश्यकता होते हैं। खेलों के माध्यम से बच्चे अनुशासन, सहयोग, नेतृत्व, धैर्य और आत्मनियंत्रण जैसे जीवनोपयोगी गुण सीखते हैं। मैदान में हार-जीत का अनुभव उन्हें जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करता है। जीत आत्मविश्वास बढ़ाती है, जबकि हार संघर्ष करने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।






