
MBMC Election:मीरा-भाईंदर महानगरपालिका चुनाव (सोर्सः सोशल मीडिया)
Mira-Bhayandar Election: मीरा-भाईंदर महानगरपालिका चुनाव के नतीजों ने इस बार सिर्फ़ राजनीतिक दलों की ताकत ही नहीं दिखाई, बल्कि मतदाताओं की नाराज़गी को भी खुलकर सामने रख दिया। इस चुनाव में सबसे ज़्यादा चर्चा का विषय बना NOTA (None of the Above), जिसने सभी दलों को चौंका दिया।
कुल 8 लाख 19 हजार 161 मतदाताओं में से 3 लाख 98 हजार 445 मतदाताओं ने मतदान किया, जो लगभग 48.54 प्रतिशत रहा। मतदान प्रतिशत भले ही औसत रहा हो, लेकिन वोटिंग ट्रेंड ने साफ़ संकेत दिया कि मतदाता मौजूदा राजनीतिक विकल्पों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं।
परिणामों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसे 1,70,315 वोट (43.11%) मिले। इसके बाद शिवसेना (शिंदे गुट) को 89,558 वोट (22.67%) प्राप्त हुए। कांग्रेस को 45,308 वोट (11.47%), जबकि यूबीटी/मनसे गठबंधन को 44,971 वोट (11.38%) मिले। इन सभी के बीच NOTA को 14,223 वोट (3.60%) मिले और यह सीधे पांचवें स्थान पर पहुँच गया।
चुनाव का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह था कि 21 सीटों पर NOTA को 5 प्रतिशत से अधिक वोट मिले। यह सामान्य विरोध नहीं, बल्कि एक संगठित असहमति का संकेत माना जा रहा है। खासतौर पर प्रभाग 20(अ) में NOTA को 1842 वोट मिले। विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र में मतदाताओं ने किसी एक पार्टी के बजाय सभी विकल्पों को नकारते हुए अपना विरोध दर्ज कराया।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, NOTA का यह उभार एंटी-इन्कम्बेंसी, स्थानीय मुद्दों की अनदेखी और उम्मीदवार चयन में असंतोष का नतीजा है। कई वार्डों में हार-जीत का अंतर इतना कम रहा कि यदि NOTA वोट किसी एक उम्मीदवार को मिले होते, तो परिणाम पूरी तरह बदल सकते थे।
यह चुनाव यह भी साबित करता है कि मतदाता उदासीन नहीं हैं। वे मतदान केंद्र तक पहुँचे, लेकिन बेहतर विकल्प न मिलने पर NOTA का सहारा लिया। यह लोकतंत्र में बढ़ती राजनीतिक समझ और जागरूकता को दर्शाता है।
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मनपा चुनाव से सभी राजनीतिक दलों के लिए संदेश साफ़ है कि अब सिर्फ़ पार्टी का नाम या पुराना आधार पर्याप्त नहीं है। स्थानीय मुद्दों, ज़मीनी काम और विश्वसनीय उम्मीदवारों को प्राथमिकता देनी होगी। यदि मतदाताओं की इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ किया गया, तो आने वाले चुनावों में NOTA और भी बड़ा फैक्टर बन सकता है।
कुल मिलाकर, इस बार का मीरा-भाईंदर चुनाव यह साबित कर गया कि NOTA सिर्फ़ एक बटन नहीं, बल्कि जनता की नाराज़गी और असहमति की मज़बूत आवाज़ है, जिसे राजनीतिक दलों को गंभीरता से सुनना होगा।






