खतरे में 39 नवनिर्वाचित ओबीसी पार्षदों की सदस्यता, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मंडरा रहा खतरा

OBC Reservation: सुप्रीम कोर्ट में लंबित ओबीसी आरक्षण मामले के चलते 39 नवनिर्वाचित पार्षदों की सदस्यता खतरे में है, जिससे मनपा में राजनीतिक अस्थिरता की आशंका बढ़ गई है।
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सुप्रीम कोर्ट (सोर्सः सोशल मीडिया)
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Supreme Court Verdict: महानगरपालिका चुनाव में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा अब एक “टाइम बम” बनकर सामने आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 15 जनवरी 2026 को हुए चुनावों को इस शर्त के साथ अनुमति दी थी कि चुनाव परिणाम अंतिम न्यायिक फैसले के अधीन रहेंगे। इसी आधार पर राज्य चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया पूरी की और अब परिणाम भी घोषित हो चुके हैं।

हालांकि, मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण 39 नवनिर्वाचित ओबीसी पार्षदों की सदस्यता पर कभी भी संकट आ सकता है। चुनाव जीतने के बावजूद इन पार्षदों पर अनिश्चितता की तलवार लटक रही है। यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला विपरीत आता है और 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण को असंवैधानिक ठहराया जाता है, तो इसके परिणाम गंभीर और राजनीतिक रूप से अस्थिर करने वाले हो सकते हैं।

भाजपा को 27 और कांग्रेस को 10 सीटों का खतरा

मनपा चुनाव परिणामों के अनुसार, यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला ओबीसी आरक्षण के खिलाफ जाता है, तो भाजपा को 27 सीटों और कांग्रेस को 10 सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है। यह सर्वविदित है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के अधीन रहते हुए ही नागपुर और चंद्रपुर महानगरपालिका के चुनावों को अनुमति दी थी। इसके बाद राज्य चुनाव आयोग ने इन दोनों मनपाओं को आधार बनाकर राज्य की सभी 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव घोषित किए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यही मुद्दा जिला परिषद चुनावों में भी सामने आया है। जहां-जहां आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक था, वहां चुनाव स्थगित रखे गए, जबकि अन्य जिलों में चुनाव घोषित किए गए। यही मॉडल महानगरपालिकाओं में भी अपनाया जा सकता था, लेकिन इसके बावजूद नागपुर और चंद्रपुर को जोखिम में डाला गया।

तो फिर से चुनाव संभव

यदि सुप्रीम कोर्ट उस आरक्षण को अवैध घोषित करता है, जिसके आधार पर चुनाव कराए गए, तो संबंधित सीटों पर चुने गए पार्षदों की सदस्यता रद्द की जा सकती है। कोर्ट उन सीटों को ‘जनरल’ (सामान्य) घोषित कर वहां पुनः चुनाव कराने का आदेश दे सकता है। कई ओबीसी पार्षद, जो फिलहाल स्थायी समितियों के अध्यक्ष या अन्य महत्वपूर्ण पदों की दौड़ में हैं, उन्हें तत्काल अपने पद छोड़ने पड़ सकते हैं। भाजपा के पास वर्तमान में 102 सीटों का बहुमत है, लेकिन ओबीसी आरक्षण रद्द होने से पूरा समीकरण बदल सकता है।

मनपा में राजनीतिक अस्थिरता की आशंका

151 सदस्यीय महानगरपालिका में बहुमत के लिए 76 सीटों की आवश्यकता होती है। यदि ओबीसी आरक्षण रद्द होता है और भाजपा की 27 सीटें घटती हैं, तो उसकी संख्या 75 तक सिमट सकती है, जो बहुमत से एक कम होगी। हालांकि कांग्रेस की भी 10 सीटें कम होंगी, लेकिन इससे तकनीकी और संवैधानिक पेच उत्पन्न हो सकते हैं। साथ ही बार-बार होने वाले कानूनी विवादों और उपचुनावों के कारण विकास कार्यों पर भी असर पड़ेगा और मनपा में राजनीतिक अस्थिरता बनी रहेगी।

मेयर के चुनाव पर भी संकट

यदि आगामी मेयर पद ओबीसी के लिए आरक्षित है और आरक्षण रद्द हो जाता है, तो पूरे शहर का नेतृत्व संकट में पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई 21 जनवरी के आसपास तय की है।

सरकार की कोशिश होगी कि वह कोर्ट को यह समझा सके कि ओबीसी आरक्षण के बावजूद सामाजिक संतुलन बना हुआ है। यदि फैसला सरकार के खिलाफ जाता है, तो नया अध्यादेश लाने या 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा के भीतर नए सिरे से वार्ड परिसीमन करने की नौबत आ सकती है। आरक्षण रद्द होने की स्थिति में विपक्षी दल (महाविकास अघाड़ी) इसका ठीकरा भाजपा सरकार पर फोड़ेंगे और आरोप लगाएंगे कि कोर्ट में ट्रिपल टेस्ट और एम्पिरिकल डेटा प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया।

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