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दीक्षाभूमि पर बसा बुद्धत्व का वंशज ‘बोधिवृक्ष’, बाबासाहेब की क्रांतिकारी धम्मभूमि को मिली पावन…
नागपुर की दीक्षाभूमि, जो संविधान निर्माता भारतरत्न डॉ. बाबासाहब आंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर सामाजिक क्रांति की नींव रखने वाली पवित्र भूमि है, अब एक और ऐतिहासिक धरोहर की साक्षी बन चुकी है।
- Written By: आंचल लोखंडे

बुद्ध पोर्णिमा विशेष (सौजन्यः सोशल मीडिया)
नागपुर: नागपुर की दीक्षाभूमि, जो संविधान निर्माता भारतरत्न डॉ. बाबासाहब आंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर सामाजिक क्रांति की नींव रखने वाली पवित्र भूमि है, अब एक और ऐतिहासिक धरोहर की साक्षी बन चुकी है। यहां स्थापित बोधिवृक्ष न केवल एक धार्मिक प्रतीक है, बल्कि वह तथागत बुद्ध के ज्ञान का जीवंत वंशज है। यह वृक्ष सामान्य पीपल नहीं, बल्कि उसी वंश का है जिसके नीचे सिद्धार्थ गौतम ने ज्ञान प्राप्त कर बुद्धत्व प्राप्त किया था।
बोधिवृक्ष का ऐतिहासिक सफर: भारत से श्रीलंका और फिर वापस नागपुर
धम्मचक्र प्रवर्तन के पश्चात सम्राट अशोक ने बुद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संगमित्रा को श्रीलंका भेजा। उनके साथ बोधगया स्थित मूल बोधिवृक्ष की एक शाखा भी भेजी गई थी। श्रद्धा और सम्मान के साथ यह शाखा श्रीलंका के अनुराधापुरा में रोपित की गई और समय के साथ यह वृक्ष एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इसकी रक्षा के लिए चारों ओर सुरक्षा घेरे बनाए गए और उसके ऊपर स्वर्णकलश स्थापित किया गया।
भदंत आनंद कौसल्यायन की पहल
इस पवित्र बोधिवृक्ष की शाखा को नागपुर की दीक्षाभूमि तक लाने का श्रेय प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान और धम्मचिंतक भदंत आनंद कौसल्यायन को जाता है। वे डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के अनुयायी और दीक्षाभूमि से गहराई से जुड़े हुए थे। जब उन्होंने श्रीलंका सरकार से इस वृक्ष की शाखा भारत भेजने का अनुरोध किया, तब वहां की संसद ने विशेष प्रस्ताव पारित कर इसकी अनुमति दी। इस ऐतिहासिक पहल में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर स्मारक समिति की महत्वपूर्ण भूमिका रही। तत्कालीन अध्यक्ष दादासाहेब गायकवाड और कार्यवाह सदानंद फुलझेले ने कौसल्यायन जी के प्रयासों को सफल बनाने में सक्रिय सहयोग दिया।
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12 मई 1968 — दीक्षाभूमि पर ऐतिहासिक रोपण
3 कोमल बोधिवृक्ष की शाखाएं विशेष रूप से कुंडियों में रखकर श्रीलंका से विमान द्वारा भारत लाईं गईं। 12 मई 1968 को नागपुर की दीक्षाभूमि में एक भव्य समारोह आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता दादासाहेब गायकवाड ने की। वहां तीनों पौधों को एक ही स्थान पर सम्मानपूर्वक रोपित किया गया। समय के साथ ये तीनों शाखाएं आपस में इस प्रकार एकरूप हो गईं कि आज यह एक विशाल वृक्ष प्रतीत होता है।
दीक्षा और दीक्षाभूमि की गौरवगाथा
14 अक्टूबर 1956 को डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने यहीं दीक्षाभूमि पर लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। यह केवल एक धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ था। उन्होंने ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था के विरुद्ध खड़े होकर समानता, करुणा और बौद्ध मूल्यों पर आधारित समाज की नींव रखी। आज दीक्षाभूमि न केवल उनके स्मरण का केंद्र है, बल्कि सामाजिक न्याय और आत्मगौरव का प्रतीक भी है।
बुद्धत्व और आंबेडकरी मिशन का प्रतीक
नागपुर का यह बोधिवृक्ष अब बुद्धत्व की आध्यात्मिक विरासत और बाबासाहब के मिशन दोनों का प्रतीक बन चुका है। यह वृक्ष न केवल अतीत से जोड़ता है, बल्कि वर्तमान पीढ़ी को धम्म, समता और करुणा की राह पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह संदेश देता है कि बाबासाहेब आंबेडकर का संघर्ष केवल सामाजिक समानता के लिए नहीं था, बल्कि आत्मबल, संस्कृति और इतिहास की पुनर्रचना के लिए भी था।
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