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नेपाल सरकार का बड़ा फैसला: विवादित सोशल मीडिया विधेयक को संसद से लिया वापस
- Written By: प्रिया सिंह
Social Media Retraction: नेपाल की अंतरिम सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाले विवादास्पद सोशल मीडिया विधेयक को वापस ले लिया है। युवाओं के कड़े विरोध के बाद यह ऐतिहासिक निर्णय आया।

नेपाल सरकार ने वापस लिया सोशल मीडिया विधेयक (सोर्स-सोशल मीडिया)
Nepal social media bill protest: नेपाल की वर्तमान अंतरिम सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने संसद में लंबित उस विवादित सोशल मीडिया विधेयक को वापस लेने का निर्णय लिया है जिसने देश में भारी जनाक्रोश पैदा किया था। यह विधेयक पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा पेश किया गया था, जिसका युवाओं और नागरिक समाज ने पुरजोर विरोध किया था। अब सरकार ने जनता की भावनाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए इस कानून को पूरी तरह निरस्त करने का फैसला किया है।
सरकार ने वापस लिया बिल
नेपाल के गृह मंत्री और सरकार के प्रवक्ता ओम प्रकाश आर्याल ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि कैबिनेट ने सोशल मीडिया विधेयक को वापस लेने का फैसला किया है। यह विधेयक काफी समय से संसद के उच्च सदन में लटका हुआ था और इसमें अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाने वाले कई कड़े प्रावधान शामिल थे। सरकार का मानना है कि पुराने नियमों को संशोधित करने के बजाय नए सिरे से विचार करना लोकतंत्र के लिए बहुत आवश्यक है।
युवाओं के आंदोलन का असर
सितंबर के महीने में ओली सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगाए गए प्रतिबंधों के खिलाफ जेन-जी युवाओं ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू किए थे। यह आंदोलन जल्द ही एक व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शन में बदल गया, जिसने तत्कालीन ओली सरकार को सत्ता से बाहर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। युवाओं का तर्क था कि यह विधेयक उनकी आवाज को दबाने और डिजिटल अधिकारों का हनन करने के लिए जानबूझकर लाया गया था।
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प्रतिबंधित थे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स
ओली सरकार ने नियामकीय प्रावधानों का हवाला देते हुए फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, यूट्यूब, एक्स, रेडिट और लिंक्डइन जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरकार का तर्क था कि इन कंपनियों ने नेपाल में अपना पंजीकरण नहीं कराया था, इसलिए उन्हें नियमों के तहत प्रतिबंधित किया गया था। हालांकि, जनता ने इसे सूचना के अधिकार पर हमला माना और देश भर में सरकार की इस नीति की कड़ी निंदा की गई थी।
कठोर सजा के प्रावधान
इस विधेयक में फर्जी पहचान का उपयोग करके भ्रामक जानकारी फैलाने वालों के लिए पांच साल तक की जेल की सजा का प्रस्ताव दिया गया था। इसके साथ ही दोषियों पर 15 लाख नेपाली रुपये तक का भारी जुर्माना लगाने का भी कड़ा प्रावधान बिल में शामिल किया गया था। डिजिटल अधिकार संगठनों ने इन दंडों को अत्यधिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने वाला करार दिया था क्योंकि इनकी परिभाषा स्पष्ट नहीं थी।
लाइसेंस और भारी जुर्माना
विधेयक के अनुसार, सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए नेपाल सरकार से लाइसेंस लेना अनिवार्य किया गया था ताकि उन्हें विनियमित किया जा सके। अगर कोई कंपनी बिना लाइसेंस के देश में अपना संचालन करती पाई जाती, तो उस पर 25 लाख नेपाली रुपये का जुर्माना लगाने का नियम था। इसके अलावा, साइबर बुलिंग, फिशिंग और सेक्सटॉर्शन जैसे अपराधों को रोकने के लिए भी इसमें बहुत सख्त नियम तय किए गए थे।
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पत्रकार महासंघ का विरोध
नेपाल पत्रकार महासंघ और कई अन्य डिजिटल अधिकार समूहों ने इस विधेयक की धाराओं को लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ बताते हुए इसकी आलोचना की थी। उनका तर्क था कि सोशल मीडिया के दुरुपयोग के नाम पर आम नागरिकों और पत्रकारों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। इसी व्यापक आलोचना और जन दबाव के कारण अंतरिम सरकार को अंततः इस विवादास्पद कानून को वापस लेने का फैसला लेना पड़ा।
Nepal government withdraws controversial social media regulation bill parliament
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