
ईरान-अमेरिका शांति वार्ता के तुर्की बाहर (सोर्स- सोशल मीडिया)
US-Iran Peace Talks: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच तुर्की ने खुद को एक बड़े मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन अब ईरानी सरकार ने बड़ा झटका दिया है। दरअसल, तुर्की के इस्तांबुल में ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता दोबारा शुरू होने की तैयारी चल रही थी, लेकिन अब ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने इस पूरी योजना पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ईरान का कहना है कि अमेरिका के साथ होने वाली अहम बातचीत तुर्की में नहीं, बल्कि ओमान में होनी चाहिए और वह भी केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित रहे। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी तीसरे देश की मौजूदगी में बातचीत नहीं करेगा। जबकि पहले इस बैठक में तुर्की, पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर और यूएई के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना थी।
सूत्रों के मुताबिक, ईरान केवल अमेरिका के साथ सीधी द्विपक्षीय बातचीत चाहता है। इसी वजह से उसने न सिर्फ बातचीत की जगह बदलने की मांग की, बल्कि एजेंडा भी सीमित कर दिया। तुर्की समेत अन्य क्षेत्रीय देशों को इस प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है, जिससे अंकारा की मध्यस्थ बनने की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है।
ईरान का रुख साफ है बातचीत केवल उसके परमाणु कार्यक्रम तक ही सीमित रहे। बैलिस्टिक मिसाइल, क्षेत्रीय गुटों या प्रॉक्सी मिलिशिया पर किसी भी तरह की चर्चा उसे मंजूर नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिका चाहता है कि मिसाइल कार्यक्रम और हिज़्बुल्लाह, हूती व इराकी मिलिशिया जैसे ईरान समर्थित गुटों पर भी बातचीत हो। यही मतभेद वार्ता को बार-बार अटकाता रहा है।
वहीं, दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर समझौता नहीं हुआ तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने तीन शर्तें रखी हैं, जिसमें ईरान यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करना, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाना और
क्षेत्रीय गुटों को समर्थन देना बंद किए जाने की बात कही गई है। हालांकि, ईरान इन शर्तों को अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला मानता है और इन्हें मानने से इनकार करता रहा है।
ईरान के भीतर हाल के सरकार विरोधी प्रदर्शनों ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है। तेहरान को आशंका है कि अगर अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की, तो जनता फिर सड़कों पर उतर सकती है और सत्ता की पकड़ कमजोर पड़ सकती है। इसी वजह से ईरान बातचीत चाहता तो है, लेकिन केवल अपनी शर्तों पर।
तुर्की जानता है कि अगर अमेरिका-ईरान तनाव युद्ध में बदला, तो उसका असर सीधे उस पर पड़ेगा। सीमा सुरक्षा, शरणार्थियों का दबाव, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता सब कुछ खतरे में पड़ सकता है। यही कारण है कि राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोआन कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय दिख रहे हैं।
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सीरिया और यूक्रेन जैसे संघर्षों का असर तुर्की पहले ही झेल चुका है। ऐसे में अमेरिका-ईरान टकराव उसके लिए सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और कूटनीति तीनों मोर्चों पर बड़ा खतरा बन सकता है। इसी डर से एर्दोआन इस टकराव को बढ़ने से पहले ही रोकना चाहते हैं।
Ans: ईरान केवल अमेरिका के साथ सीधी द्विपक्षीय बातचीत चाहता है। उसका मानना है कि तीसरे देशों की मौजूदगी से दबाव बढ़ेगा और एजेंडा परमाणु मुद्दे से आगे चला जाएगा।
Ans: ओमान पहले भी ईरान-अमेरिका बैकचैनल बातचीत में भरोसेमंद मध्यस्थ रहा है। वह अपेक्षाकृत तटस्थ है और ईरान को लगता है कि वहां गोपनीय और सीमित बातचीत संभव है।
Ans: ईरान बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय गुटों और प्रॉक्सी मिलिशिया पर चर्चा नहीं चाहता। वह बातचीत को केवल अपने परमाणु कार्यक्रम तक सीमित रखना चाहता है।
Ans: अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन बंद करे, मिसाइल कार्यक्रम रोके और हिज़्बुल्लाह, हूती जैसे क्षेत्रीय गुटों को समर्थन देना खत्म करे।
Ans: युद्ध की स्थिति में तुर्की को शरणार्थी संकट, सीमा सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा है। इसलिए एर्दोआन टकराव से पहले कूटनीतिक समाधान चाहते हैं। Select 74 more words to run Humanizer.






