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नवभारत विशेष: ममता बनाम केंद्र की राजनीति के दांवपेंच
West Bengal Assembly Election: बंगाल में भी यह नई बात नहीं है। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, राशन वितरण से जुड़े आरोप- इन सब मामलों में टीएमसी से जुड़े नेताओं की गिरफ्तारी या पूछताछ हुई है।
- Written By: दीपिका पाल

ममता बनाम केंद्र की राजनीति (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: ईडी की कार्रवाई के बीच ममता बनर्जी जिस तरह टीएमसी के आईटी, सेल में घुसकर जरूरी फाइलें बंगाल पुलिस के संरक्षण में ले गईं, वह व्यक्तिगत दुस्साहस भर नहीं है, वह प्रदेश के चुनावों में बाजी मारने के लिए येन केन प्रकारेण गढ़ा जा रहा सियासी नैरेटिव है, जिसमें जीत-हार का अनुमान दांव पर है। इसके साथ ही बंगाल की राजनीति एक बार फिर से तीखे टकराव के दौर में आ गयी है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के आईटी सेल कार्यालय में पहुंचना, पुलिस सुरक्षा में कुछ फाइलों का वहां से हटाया जाना और इसके बाद केंद्र पर ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ के आरोप ये सब दांवपेंच आने वाले विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में गढ़े जा रहे एक सुसंगठित राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा हैं।
क्या ममता बनर्जी का यह दुस्साहस व्यक्तिगत आवेग है या फिर चुनावी बाजी पलटने के लिए सोची-समझी रणनीति ? और क्या केंद्र की एजेंसियों की कार्रवाई केवल कानून के दायरे में हैं या समय और अपने तरीके से वह कोई राजनीतिक संदेश भी देती है? पिछले कुछ वर्षों में केंद्रीय जांच एजेंसियों- खासकर प्रवर्तन निदेशालय की सक्रियता विपक्ष-शासित राज्यों में कुछ ज्यादा ही बढ़ी है।
बंगाल में भी यह नई बात नहीं है। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, राशन वितरण से जुड़े आरोप- इन सब मामलों में टीएमसी से जुड़े नेताओं की गिरफ्तारी या पूछताछ हुई है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि यह कानून का स्वाभाविक रास्ता है; विपक्ष का आरोप है कि एजेंसियां केंद्र के राजनीतिक दबाव में काम कर रही हैं। ममता बनर्जी ने संदेश देने की कोशिश की है, ‘मुख्यमंत्री अपने लोगों के साथ खड़ी हैं’ और ‘केंद्र की एजेंसियां राज्य की स्वायत्तता पर हमला कर रही हैं।’ जबकि ईडी ने कोलकाता हाईकोर्ट में ममता बनर्जी की इस हरकत के खिलाफ दरवाजा खटखटाया है, ममता बनर्जी सड़क पर धरना देने वाली नेता रही हैं; मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने जनांदोलन की शैली छोड़ी नहीं।
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आईटी सेल में प्रवेश कर फाइलें हटाने का कदम कानूनी दृष्टि से भले ही विवादास्पद हो राजनीतिक दृष्टि से उनके पुराने व्यक्तित्व के अनुरूप है। उनके समर्थकों के लिए यह साहस है, विपक्ष के लिए कानून व्यवस्था में हस्तक्षेप। लेकिन चुनावी राजनीति में संदेश सरल रखा जाता हैः ‘केंद्र अन्याय कर रहा है, और ममता उसका सामना कर रही हैं।’ यह वही नैरेटिव है जिसने 2021 के विधानसभा चुनावों में उन्हें बड़ी जीत दिलाई थी दिल्ली बनाम कोलकाता, बाहरी ताकत बनाम बंगाल की अस्मिता। ममता बनर्जी ने केंद्र पर आरोप लगाया कि ईडी की कार्रवाई चुनाव से पहले राज्य सरकार को बदनाम करने की साजिश है।
इस आरोप का तथ्यात्मक मूल्यांकन अलग विषय है, लेकिन राजनीतिक असर स्पष्ट है। बंगाल में ‘बाहरी हस्तक्षेप’ का विचार ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील रहा है- चाहे वह भाषा, संस्कृति या सत्ता का सवाल हो या फिर केन्द्रीय एजेंसियों द्वारा घोटालों की जांच। ऐसे मौकों में तृणमूल कांग्रेस हमेशा खुद को बंगाल की आवाज के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि बीजेपी को ‘केंद्र की पार्टी’ के रूप में। केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों का कहना है कि वे कानून के अनुसार काम कर रही हैं।
‘षड्यंत्र’ का आरोप और अस्मिता की राजनीति
राजनीति में ‘कब’ और ‘कैसे’ उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना ‘क्या’। चुनाव से ठीक पहले की गई कार्रवाई, बार-बार विपक्षी नेताओं को निशाना बनाना-इनसे संदेह तो पैदा होता ही है कि कानून के साथ-साथ केंद्र द्वारा राजनीतिक लाभ भी साधा जा रहा है। यह स्थिति केंद्र के लिए भी जोखिम भरी है। ममता बनर्जी का यह दुस्साहस केवल एक घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र में सत्ता-संघर्ष की गहरी तस्वीर है। एक तरफ कानून और संस्थाओं की विश्वसनीयता का प्रश्न है, दूसरी तरफ चुनी हुई सरकार और केंद्र के बीच टकराव। लोकतंत्र में जांच एजेंसियों को स्वतंत्र और निष्पक्ष होना चाहिए और निर्वाचित नेताओं को कानून के दायरे में रहकर विरोध दर्ज कराना चाहिए।
लेख- डॉ. अनिता राठौर के द्वारा
Political maneuvering between mamata and the central government
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