

Congress vs BJP Funding: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, बीजेपी बलशाली पार्टी है जिसे 2024-25 में 6,088 करोड़ रुपये चंदा मिला। यह रकम कांग्रेस को मिले चंदे से 12 गुना है। बीजेपी को हाथ फैलाकर चंदा मांगने नहीं जाना पड़ता। वह खुद ही उसकी झोली में आ टपकता है। बीजेपी के शीर्ष 30 दानदाताओं में देश की कई बड़ी कंपनियों का समावेश है।'
हमने कहा, 'इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड योजना रद्द किए जाने पर भी बीजेपी को कोई फर्क नहीं पड़ा। उसका चंदा ऐसा है जिसे कोई ग्रहण नहीं लगता। चंदा देने वाली कंपनियां या उद्योग अपने लिए सरकार की अनुकंपा चाहते हैं ताकि वे और अधिक फूलें-फलें। बिना मतलब के कोई चंदा नहीं देता। सत्ता में जो भी पार्टी रहे, वह खुशहाल और मालामाल हो जाती है। कांग्रेस अदाणी और अंबानी का नाम लेकर कितना ही चिल्लाती रहे, कोई असर नहीं पड़ता। रिश्तों की गहराई और अभिन्नता बढ़ती ही चली जाती है। देश का विकास पूंजीपति ही करेंगे, कोई टुटपुंजिया नहीं! सीधा आदान-प्रदान है। तुम मुझे चंदा दो मैं तुम्हे एयरपोर्ट, बंदरगाह और न जाने क्या-क्या बनाने के लिए जमीन और सुविधाएं दूंगा। इसे कहते हैं- इस हाथ दे, उस हाथ ले। बीजेपी की हालत यह है कि मांगे बिन मोती मिलें। चुनावी चंदा हमेशा बढ़ता है जबकि आसमान का चंदा पूर्णिमा से अमावस के बीच घटता चला जाता है। जिन पार्टियों को बहुत कम चंदा मिलता है, वह लापता होने लगती हैं। पूंजीपतियों को पानी पी-पीकर कोसने वाले कम्युनिस्ट किस तरह नष्ट हुए, आपने देखा ही है।'
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, लोकतंत्र की लिमोजीन कार धनरूपी ईंधन से ही चलती है। नेतागिरी में निवेश करने वाले मालदार बन जाते हैं। न उन्हें महंगाई दूर करनी है, न किसी को नौकरी-रोजगार देना है। चुनाव के पहले रेवड़ी रूपी खैरात की बरसात करके वोट ले लो और फिर जनता को अगले 5 वर्ष के लिए भूल जाओ। बच्चे को आकाश का चंदा दिखाकर और मतदाता को चंद लुभावने वादे कर बहलाया जाता है। विपक्ष हर बार हताश से हाथ मलता रह जाता है।'
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा