ठेका कर्मियों की हड़ताल से स्वास्थ्य सेवा बेहाल ( सौ.डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: महाराष्ट्र की स्वास्थ्य सेवा पहले ही बेहाल है, ऊपर से 38,000 ठेका कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल की वजह से रोगियों की जान पर बन आई है।सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर व नर्स उपलब्ध नहीं हैं।टेक्नीशियन व पैरामेडिकल स्टाफ भी हड़ताल पर है।ग्रामीण व जिला अस्पतालों का कामकाज ठप पड़ा है।ऐसी परिस्थिति किसी भी सरकार के लिए शोभनीय नहीं है।हड़ताली ठेका कर्मियों की मांग है कि उन्हें स्थायी सेवा में शामिल कर लिया जाए।उनकी अन्य मांगें भी हैं।मार्च माह में सरकार ने 10 वर्ष से अधिक सेवा वाले कर्मचारियों का समायोजन करने का निर्णय लिया था।
लगभग 14,000 कर्मचारी इसके लिए पात्र माने गए थे लेकिन जीआर निकलने के बाद भी अब तक लागू नहीं हो पाया।राज्य के 4 विभागों में 49,500 पद मंजूर होने पर भी कर्मचारियों को स्थायी स्वरूप की नौकरी नहीं दी जा रही है।इसके पूर्व भी इन कर्मियों ने आंदोलन किया था, तब उन्हें आश्वासन दिया गया था।वादा नहीं निभाने पर वह पुन: हड़ताल पर उतर आए।इस वजह से जनता को भारी असुविधा हो रही है।महिलाओं की प्रसूति, नवजात शिशु की देखभाल करने के लिए कर्मचारी नहीं हैं।आपातकालीन इलाज के लिए कोई नहीं है।ग्रामीण क्षेत्रों की हालत अत्यंत चिंताजनक है।वहां ठेके पर नियुक्त परिचारिका प्रसूति की जिम्मेदारी संभालती हैं।
अब महिलाओं को निजी अस्पताल जाने को कहा जा रहा है।गरीब परिवार के लिए प्राइवेट अस्पताल का हजारों रुपए का बिल देना संभव नहीं है।ऐसे में किसान, मजदूर और गरीब परिवार क्या करें? जिन्हें तत्काल इलाज की आवश्यकता है, उनकी उचित व्यवस्था नहीं होने से जान जाने का खतरा है।सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था खोखली हो गई है।हड़ताल के बाद उसका राजनीतिक हल निकालने की कोशिश की जाती है।वादे पूरे नहीं होने से फिर कुछ माह बाद आंदोलन शुरू हो जाता है।सरकार व कर्मचारियों की खींचतान का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ता है।कर्मचारियों को भी जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।स्वास्थ्य कर्मियों की लापरवाही की वजह से एक जिला अस्पताल में इन्क्यूबेटर में रखे 10 नवजात शिशुओं की मौत हो गई थी।
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ऐसी भी खबरें आती हैं कि सरकारी अस्पताल के कुछ डाक्टर अपने मरीजों को निजी अस्पतालों को रिफर कर देते हैं।कोरोना काल में इसी सरकारी स्वास्थ्य सेवा ने हजारों लोगों के प्राण बचाए थे लेकिन ठेका पद्धति की वजह से यह सेवा खोखली होती जा रही है।प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सर्वाधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, जहां डाक्टर, परिचारिक और औषधियों का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहना चाहिए।मेडिकल शिक्षा पर हर वर्ष करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं लेकिन स्वास्थ्य सेवा पर जीडीपी का केवल 4.4 प्रतिशत ही खर्च किया जाता है।ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा को तत्पर बनाने की आवश्यकता है.
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा