महाराष्ट्र में लाखों मतदाताओं के नाम गायब, पूर्व विधायक वाघमारे ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब

Maharashtra News: महाराष्ट्र में लाखों मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से गायब होने का मामला सामने आया है। एनसीपी नेता चरण वाघमारे ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा, मतदाताओं में भारी आक्रोश है।
Maharashtra former MLA Charan Waghmare
पूर्व विधायक चरण वाघमारे (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Names Missing From Voter List: बिहार की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हेरफेर के आरोपों के बीच अब महाराष्ट्र में भी लाखों मतदाताओं के नाम सूची से गायब होने का मामला सामने आया है। इस मुद्दे को एनसीपी (शरद पवार) के जिलाध्यक्ष और पूर्व विधायक चरण वाघमारे ने उठाया है। उन्होंने चुनाव आयोग के सामने ठोस सबूत प्रस्तुत करते हुए इस गंभीर अनियमितता पर जवाब मांगा है। कई नागरिकों ने भी आयोग की वेबसाइट पर अपनी नामावली न दिखने की शिकायत की है, जिससे मतदाताओं में भारी आक्रोश है।

मतदाताओं का सवाल है कि अगर उनका नाम ही सूची में नहीं है, तो उन्हें मतदान का अधिकार कैसे मिलेगा? इस मुद्दे को लेकर विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग सरकार के दबाव में काम कर रहा है और मतदाता सूचियों में किए गए बदलावों का उद्देश्य सत्ताधारी दल को फायदा पहुंचाना है।

भंडारा में भी सामने आई गड़बड़ी

यह गड़बड़ी केवल एक या दो स्थानों तक सीमित नहीं है। भंडारा जिले में भी विधानसभा चुनाव 2024 के दौरान बड़ी संख्या में अनियमितताएं सामने आईं। एक विशेष उदाहरण देते हुए वाघमारे ने बताया कि तुमसर के उपविभागीय अधिकारी दर्शन निकालजे के क्षेत्र में लगभग 300 सरकारी कर्मचारी, जो स्वयं मतदाता थे और चुनावी सेवा कार्य में लगे थे, मतदान से वंचित रह गए।

इन कर्मचारियों ने अपनी शिकायतें दर्ज कराई थीं, लेकिन आरोपों के अनुसार, चुनाव आयोग ने इस पर कोई कदम नहीं उठाया। यह घटना दर्शाती है कि यह समस्या केवल आम नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारियों को भी प्रभावित कर रही है, जो अपने आप में एक गंभीर मुद्दा है।

मतदाताओं के संशय को दूर करने की मांग

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए, पूर्व विधायक चरण वाघमारे ने चुनाव आयोग से मांग की है कि वह मतदाताओं के मन में उठ रहे संशय को दूर करे। उन्होंने आयोग से कहा कि वह लंबित मामलों का समयबद्ध निपटारा करे और यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में इस तरह की गड़बड़ी न हो।

यह मुद्दा लोकतंत्र की नींव पर सवाल खड़ा करता है, क्योंकि एक पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव के लिए सही मतदाता सूची का होना सबसे पहली शर्त है। लाखों नागरिकों के नाम गायब होने से न केवल उनका संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो रहा है, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान लग रहा है।

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