
Duryodhana (Source. Pinterest)
Duryodhana Story: महाभारत की बात होते ही जब भी दानवीर शब्द आता है, तो सबसे पहले कर्ण का नाम लिया जाता है। लोककथाओं, धार्मिक प्रवचनों और सामान्य जनमानस में कर्ण को ही महान दानी के रूप में स्थापित किया गया है। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि महाभारत का खलनायक कहलाने वाला दुर्योधन भी दानवीर था? लोककथाएं इस सवाल का जवाब हां में देती हैं।
प्रचलित कथाओं के अनुसार, दुर्योधन को भी एक उदार और दानशील राजा के रूप में जाना जाता है। कहा जाता है कि उसने कभी किसी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं लौटाया। चाहे वह याचक हो, साधु हो या ब्राह्मण दुर्योधन हर किसी की यथासंभव सहायता करता था। यही कारण है कि कुछ लोककथाओं में उसे भी दानवीर की उपाधि दी गई है, हालांकि मुख्यधारा की कहानियों में यह पहलू अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
दुर्योधन की दानशीलता केवल धन तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह सम्मान देने में भी आगे रहता था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कर्ण है। समाज द्वारा तिरस्कृत कर्ण को दुर्योधन ने न सिर्फ अपना मित्र बनाया, बल्कि उसे अंगराज का पद देकर सम्मान भी दिया। यह कदम उस दौर में एक बड़ा सामाजिक संदेश माना जाता है। दुर्योधन ने कर्ण की योग्यता को पहचाना और उसे वह स्थान दिया, जिसका वह हकदार था।
इतिहास और कथाओं में कर्ण की दानवीरता इतनी प्रमुख हो गई कि दुर्योधन की उदारता उस छाया में दबकर रह गई। जबकि लोककथाएं साफ कहती हैं कि दुर्योधन भी दान के मामले में पीछे नहीं था। फर्क सिर्फ इतना था कि कर्ण का त्याग अधिक भावनात्मक और प्रसिद्ध प्रसंगों से जुड़ा है, जबकि दुर्योधन का दान शांत और निरंतर था।
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महाभारत के पात्रों को केवल अच्छे या बुरे के खांचे में बांधना शायद सही नहीं होगा। दुर्योधन एक ओर अहंकार और सत्ता की लालसा का प्रतीक था, तो दूसरी ओर वह दानशील और अपने मित्रों के प्रति निष्ठावान भी था। यही द्वंद्व महाभारत को आज भी प्रासंगिक बनाता है।






