
Ramayana (Source. Pinterest)
Ramayana in The World: कहते हैं “हरि अनंत, हरि कथा अनंता” अर्थात भगवान अनंत हैं और उनकी कथा भी अनंत है। श्रीराम की कथा भी ऐसी ही है, जो समय, देश और भाषा की सीमाओं से परे जाकर आज पूरी दुनिया में अलग-अलग रूपों में जीवित है। बहुत कम लोग जानते हैं कि श्रीराम की कथा सबसे पहले हनुमानजी ने लिखी थी, उसके बाद महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की। वाल्मीकि राम के समकालीन थे, उन्होंने राम को देखा, उनके जीवन को समझा और इसलिए उनकी रामायण को सबसे प्रामाणिक माना जाता है।
जब महर्षि वाल्मीकि ने रामकथा लिखने का संकल्प लिया, तब उन्हें नारद मुनि का मार्गदर्शन मिला। उसी काल में देवताओं का धरती पर आना-जाना सामान्य था और वे हिमालय के उत्तर क्षेत्र में निवास करते थे। राम का 14 वर्षों का वनवास केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि अनेक तीर्थों और क्षेत्रों से जुड़ी एक ऐतिहासिक कथा है, जिसे अलग-अलग परंपराओं ने अपने ढंग से संजोया।
वाल्मीकि रामायण तथ्यों और घटनाओं पर आधारित है, जबकि बाद की कई रामायणें श्रुति और जनश्रुतियों के आधार पर लिखी गईं। जैसे बुद्ध ने अपने शिष्यों को पूर्व जन्मों की कथा के रूप में रामकथा सुनाई, तुलसीदास को उनके गुरु ने सोरों क्षेत्र में रामकथा का उपदेश दिया। इसी तरह हर देश और संस्कृति ने अपनी लोकपरंपरा के अनुसार रामायण लिखी।
दक्षिण भारत में राम का विशेष महत्व है। कर्नाटक और तमिलनाडु में श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और तमिलनाडु में ही रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देशों में रावण को भी सम्मान मिला, इसलिए वहां रामकथा का स्वरूप थोड़ा अलग दिखाई देता है।
पिछले 2500 वर्षों में रामकथा अन्नामी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, सिंहली, थाई, तिब्बती, इंडोनेशियाई, फारसी सहित हजारों भाषाओं में लिखी गई। अनुवादों और कालांतर में बदलाव जरूर हुए, लेकिन राम की मूल कथा आज भी वैसी ही है।
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मान्यता है कि भगवान शिव ने सबसे पहले माता पार्वती को रामकथा सुनाई थी, जिसे एक कौवे ने भी सुना। वही कौवा आगे चलकर कागभुशुण्डि बना। इसी परंपरा से अध्यात्म रामायण प्रसिद्ध हुई। वहीं, हनुमानजी द्वारा शिला पर लिखी गई रामकथा ‘हनुमन्नाटक’ के नाम से जानी जाती है, जो वाल्मीकि रामायण से भी पहले मानी जाती है।
कवियों, साहित्यकारों, नाटककारों और लोक कलाकारों ने रामायण को नए रंग-रूप दिए, लेकिन मूल कथा से छेड़छाड़ नहीं की। यही कारण है कि सदियों बाद भी रामकथा सिर्फ काव्य नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और जीवन दर्शन का आधार बनी हुई है।






