

Devotion and Renunciation: आध्यात्मिक जगत में प्रेमानंद जी महाराज का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनके प्रवचन सीधे मन को छूते हैं और आम इंसान को जीवन का गहरा अर्थ समझाते हैं। उनका एक सशक्त संदेश है "अकेले रहना शुरू करो"। यह वाक्य सुनने में भले कठोर लगे, लेकिन इसके पीछे जीवन को मोक्ष की ओर ले जाने वाली गहरी सीख छुपी है।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति सच में परम युगल को पाना चाहता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति चाहता है, तो उसे सांसारिक संग छोड़ना होगा। सच्चे संतों की संगति केवल ईश्वर की कृपा से मिलती है। ऐसे में या तो महापुरुषों के सान्निध्य में रहिए, या फिर असंग अर्थात एकांत को अपनाइए।
महाराज चेतावनी देते हैं कि हर इंसान के हृदय में एक पिशाच छुपा होता है काम का पिशाच। यह कभी तृप्त नहीं होता और अंततः आत्मिक पतन की ओर ले जाता है। विपरीत शरीर के प्रति आकर्षण को वे राक्षसी वृत्ति बताते हैं। गृहस्थ जीवन में यह दोष एक पत्नी के प्रति निष्ठा से नियंत्रित होता है, जबकि वैराग्य में गुरु और भगवान के पूर्ण शरणागति से। स्त्रियों को काम दृष्टि से देखने वाले साधक के लिए वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं पतन निश्चित है। इसके विपरीत, उनमें मातृभाव या दिव्यता का भाव रखें।
मानव शरीर को महाराज भवसागर पार करने वाली नौका बताते हैं, लेकिन बिना कुशल केवट के यह नौका पार नहीं लग सकती। वह केवट हैं सद्गुरु। अपनी बुद्धि पर घमंड करने वाला व्यक्ति उलझता ही जाता है, लेकिन जो गुरु चरणों में शरण ले लेता है, उसकी टूटी नाव भी पार लग जाती है। गुरु द्वारा दिया गया "नाम-मंत्र" ही सच्चा सहारा है।
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार "राधा राधा" केवल शब्द नहीं, बल्कि अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाला प्रकाश है। जैसे साबुन मैल हटाता है, वैसे ही सत्संग और नाम-जप जन्मों-जन्मों की मानसिक गंदगी को साफ करते हैं। नाम-जप से मन वश में आता है, पाप जल जाते हैं और भीतर विवेक का दीप प्रज्वलित होता है।
महाराज साधकों को भीड़, दिखावे और प्रचार से दूर रहने की सलाह देते हैं। ईश्वर को पाए बिना उपदेश देने की इच्छा साधना को नष्ट कर देती है। दुनिया की नजर में भले आप 'पागल' दिखें, लेकिन भीतर अपनी भक्ति को सुरक्षित रखें। वृंदावन जैसी पावन भूमि में साधना करते-करते एक दिन ऐसा भी आएगा जब हृदय प्रिया-प्रीतम की स्मृति में रो पड़ेगा यही मानव जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।