
संत रविदास जी (सौ.सोशल मीडिया)
Sant Ravidas Life Lessons:आज 1 फरवरी 2026 को संत रविदास जी की जयंती मनाई जा रही है। गुरु रविदास जी भारतीय संत परंपरा के ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिन्होंने भक्ति, समानता और मानवता का संदेश पूरे समाज को दिया।
वे न केवल एक संत और कवि थे, बल्कि एक निर्भीक समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने जाति-भेद और ऊंच-नीच जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। अपने दोहों और वचनों के माध्यम से उन्होंने यह सिखाया कि ईश्वर भक्ति का मार्ग मन की पवित्रता और कर्मों की श्रेष्ठता से होकर गुजरता है।
आज संत रविदास जी की जयंती के शुभ अवसर पर आइए जानें उनके प्रसिद्ध दोहे
1. मन चंगा तो कठौती में गंगा का अर्थ
अर्थ- जिस व्यक्ति का मन पवित्र होता है, उसके बुलाने पर मां गंगा भी एक कठौती (बर्तन) में आ जाती हैं।
अर्थ- किसी को सिर्फ इसलिए नहीं पूजना चाहिए क्योंकि वह किसी पूजनीय पद पर बैठा है। यदि व्यक्ति में उस पद के योग्य गुण ही नहीं हैं तो उसे नहीं पूजना चाहिए। इसकी जगह ऐसे व्यक्ति को पूजना सही है जो किसी ऊंचे पद पर तो नहीं है लेकिन बहुत गुणवान है।
अर्थ- निर्मल मन में ही भगवान वास करते हैं। अगर आपके मन में किसी के लिए बैर भाव नहीं है, कोई लालच या द्वेष नहीं है तो आपका मन ही भगवान का मंदिर, दीपक और धूप है। ऐसे ही पवित्र विचारों वाले मन में प्रभु सदैव निवास करते हैं।
अर्थ- कोई भी व्यक्ति किसी जाति में जन्म के कारण नीचा या छोटा नहीं होता है। किसी व्यक्ति को निम्न उसके कर्म बनाते हैं। इसलिए हमें सदैव अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। हमारे कर्म सदैव ऊंचे होने चाहिए।
अर्थ- जिस हृदय में दिन-रात बस राम के नाम का ही वास रहता है, ऐसा भक्त स्वयं राम के समान होता है। राम नाम की ऐसी माया है कि इसे दिन-रात जपने वाले साधक को न तो किसी के क्रोध से क्रोध आता है और न ही कभी काम भावना उस पर हावी होती है।
अर्थ- किसी की जाति नहीं पूछनी चाहिए क्योंकि संसार में कोई जाति−पाँति नहीं है। सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं। यहाँ कोई जाति, बुरी जाति नहीं है।
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अर्थ- हीरे से बहुमूल्य हरी यानि कि भगवान हैं। उनको छोड़कर अन्य चीजों की आशा करने वालों को निश्चित ही नर्क प्राप्त होता है। इसलिए प्रभु की भक्ति को छोडकर इधर-उधर भटकना व्यर्थ है।






