
(दारव्हा नगर परिषद चुनाव सौजन्यः सोशल मीडिया)
Darwha Municipal Council Election : नगर परिषद चुनाव से पहले ही राजनीतिक माहौल पूरी तरह गरम हो चुका है। रविवार और सोमवार को हुई तेज़ घटनाओं ने चुनावी हलचल और भी बढ़ा दी है। इस बीच शिवसेना ने सुनील चिरडे के नाम पर सहमति जताई, जबकि टिकट न मिलने से नाराज दामोदर लड्ढा ने शिवसेना छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। इससे पहले वे भाजपा और शिवसेना दोनों की ओर से नगराध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल कर चुके थे। अब वे आधिकारिक रूप से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ेंगे। इस कदम से पूरा चुनावी गणित बदल गया है।
महायुति का पुराना समीकरण पूरी तरह बिखर चुका है। शिवसेना (शिंदे गुट), राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजित पवार गुट) और भाजपा-तीनों ने अपने-अपने उम्मीदवार स्वतंत्र रूप से मैदान में उतार दिए हैं। कई कार्यकर्ताओं ने टिकट न मिलने की आशंका में एक ही समय पर भाजपा, कांग्रेस, शिवसेना और निर्दलीय के रूप में नामांकन भर दिए। इससे मतों के बिखराव और बहुकोणीय मुकाबले की आशंका और बढ़ गई है।
नगराध्यक्ष पद के लिए कुल 15 नामांकन दाखिल हुए हैं। कांग्रेस से अशोक नामदेव चिरडे और शिवसेना (शिंदे गुट) से सुनील नामदेवराव चिरडे आमने-सामने हैं। समाजवादी पार्टी के आरिफ काज़ी और राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजित पवार गुट) के सलीम सोलंकी ने भी नामांकन दाखिल किया है, जिससे शहर के लगभग 11 हजार मुस्लिम मतदाताओं का समीकरण और दिलचस्प हो गया है।
चुनाव विभाग ने मंगलवार, 18 नवंबर को नामांकन की जांच पूरी की। नगरसेवक पद के 162 आवेदनों में से 98 पात्र और 64 अपात्र पाए गए। नगराध्यक्ष पद के 27 आवेदनों में से 14 पात्र और 13 अपात्र घोषित किए गए। आवेदन वापस लेने की अंतिम तिथि शेष होने के कारण अंतिम सूची में बदलाव संभव है।
दारव्हा नगर परिषद के अध्यक्ष पद के लिए सभी दलों के कई कार्यकर्ता इच्छुक थे। इस वजह से सभी पार्टियों ने A-B फॉर्म अंतिम दिन ही दिए ताकि बगावत को रोका जा सके। परंतु टिकट मिलने की अनिश्चितता के चलते कई कार्यकर्ताओं ने पहले ही विभिन्न दलों से या निर्दलीय के रूप में अलग-अलग नामांकन भर दिए थे। इससे स्पष्ट है कि इस बार कार्यकर्ता पार्टी से ज्यादा चालाक साबित हुए हैं। परिणामस्वरूप शहर में चर्चाओं और राजनीतिक भविष्यवाणियों का दौर जारी है।
शिवसेना (उद्धव गुट) और कांग्रेस गठबंधन से कांग्रेस को कुछ क्षेत्रों में लाभ मिलने की संभावना है। वहीं शहर में भाजपा के मजबूत वोट बैंक के कारण वह चुनावी परिणामों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। वंचित बहुजन आघाड़ी, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के मैदान में आने से मुकाबला और जटिल हो गया है। मनसे ने अभी तक अपनी आधिकारिक भूमिका स्पष्ट नहीं की है, जिससे उनकी घोषणा भी समीकरण बदल सकती है।
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राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार का चुनाव बहुकोणीय, रोमांचक और अप्रत्याशित मोड़ों से भरा होगा। टिकट न मिलने से कई कार्यकर्ता खुले रूप से बगावत कर रहे हैं, जबकि कुछ ने अन्य दलों या निर्दलीय के रूप में अपनी दावेदारी पेश की है। ऐसे में दारव्हा नगर परिषद चुनाव अब तक का सबसे दिलचस्प और संघर्षपूर्ण मुकाबला बनने जा रहा है।






