
हजारों वर्ष पुरातन दिगंबर जैन मूर्तियाँ मिलीं (सौजन्यः सोशल मीडिया)
Washim Shirpur Jain: देशभर के जैन समाज का श्रद्धास्थान-वाशिम जिले की मालेगांव तहसील के शिरपुर जैन गांव में स्थित विश्वविख्यात श्री अंतरिक्ष पार्श्वनाथ दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र-को जैन धर्मावलंबियों की काशी माना जाता है। इसी शिरपुर जैन स्थित श्री अंतरिक्ष पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर परिसर में, पिछले हिस्से में स्थित पुरानी धर्मशाला के दो कमरों के नूतनीकरण के दौरान एक तलघर मिला।
तीर्थरक्षक ऐलक सिद्धांतसागर महाराज और तात्याभैय्या के मार्गदर्शन में कार्य करते समय मिले इस तलघर में जैन दिगंबर समाज की हजारों वर्ष पुरानी सैकड़ों छोटी-बड़ी पुरातन मूर्तियां पाई गईं। तात्याभैय्या के अनुसार यह मूर्तियां सन् 1461–1462 के आसपास की बताई जा रही हैं।
अगस्त 2025 में मंदिर के सामने स्थित पूजा मंडप के पीछे मौजूद प्राचीन धर्मशाला का तलघर, जो तीन पीढ़ियों से बंद था, पहली बार खोला गया। करीब सौ वर्ष से बंद पड़े कपाट खोलने पर यहां से सन् 1365 और 1461 की लगभग 600 वर्ष पुरानी 31 प्रमुख प्रतिमाएं तथा सैकड़ों छोटी प्रतिकृतियां मिली हैं।
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वाशिम से लगभग 20 किमी दूर स्थित शिरपुर (जैन) का श्री अंतरिक्ष पार्श्वनाथ ऐतिहासिक मंदिर और पौराणिक अंतरिक्ष पवली मंदिर जैन समाज का प्रमुख तीर्थस्थान है।
इस मंदिर में स्थित पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा अद्वितीय है। यह प्रतिमा जमीन से ऊपर अधर में स्थित है। मान्यता है कि प्राचीन काल में प्रतिमा के नीचे से एक घुड़सवार आसानी से निकल सकता था। समय के साथ यह अंतर कम होता गया और वर्तमान में प्रतिमा के नीचे सिर्फ एक कपड़ा आर-पार किया जा सकता है। यह घटना अपने आप में एक अद्भुत चमत्कार मानी जाती है।

शिरपुर स्थित पवली मंदिर की मान्यता के अनुसार, 10वीं शताब्दी में तपोमूर्ति दिगंबर वीरचंद महाराज ध्यानस्थ थे। उस समय गोपाल नामक एक ग्वाला वहां पहुंचा। उसने महाराज को प्रणाम किया और अपनी व्यथा बताई। महाराज ने उसे देवी मंत्र का जाप करने का निर्देश दिया। गोपाल की तपस्या से देवी मां प्रसन्न हुईं और उनके आशीर्वाद से वह ग्वाला से राजा श्रीपाल बन गया। राजा बनने के बाद उसने दक्षिण क्षेत्र का विकास किया।






