न डिजिटल, न शिक्षक-आदिवासी बच्चों का भविष्य अधर में; नासिक की आश्रमशालाओं में 580 पद खाली

Nashik Education Issue: महाराष्ट्र की आदिवासी आश्रमशालाओं में 1000 से अधिक शिक्षक पद खाली हैं। अकेले नासिक विभाग में 580 पद रिक्त होने से आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
Neither digital resources nor teachers—the future of tribal children hangs in the balance; 580 posts are vacant in ashram schools in Nashik
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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Tribal Student Education: नासिक महाराष्ट्र के दुर्गम आदिवासी क्षेत्रों में स्थित सरकारी आश्रमशालाओं से एक ऐसी डरावनी तस्वीर सामने आई है, जो 'पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया' जैसे नारों को मुंह चिढ़ा रही है। जहां एक ओर सरकार इन मासूम बच्चों को डिजिटल इंडिया और मुख्यधारा से जोड़ने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं कड़वा सच यह है कि इन स्कूलों की दीवारों के भीतर पढ़ाने के लिए शिक्षक ही मौजूद नहीं हैं। पूरे राज्य की आश्रमशालाओं में शिक्षकों के 1000 से अधिक पद धूल फांक रहे हैं, जिनमें से अकेले नासिक विभाग में शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों के 580 पद खाली पड़े हैं।

गुणवत्ता पर पड़ रहा सीधा असर

आदिवासी विकास विभाग के अंतर्गत नासिक, कलवण, राजूर, यावल, धुलिया, नंदुरबार और तलौदा जैसे सात एकीकृत परियोजनाओं के तहत 212 सरकारी और 224 सहायता प्राप्त (अनुदानित) आश्रमशालाएं सांसें ले रही हैं। सरकार यहां पहली से दसवीं तक की शिक्षा, शानदार हॉस्टल, गरम खाना और मुफ्त किताबें तो दे रही है, लेकिन उन्हें समझाने और ज्ञान देने वाले गुरुजी ही गायब हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब नींव ही कमजोर होगी, तो मुफ्त सुविधाओं की ये इमारत किस काम की? शिक्षा के गिरते स्तर के बीच एक और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। जहां एक तरफ शिक्षकों की कमी है, वहीं जो मुट्ठी भर शिक्षक बचे हैं, उन्हें 'गैर-शैक्षणिक' कामों की भेंट चढ़ाया जा रहा है।

हाल ही में प्राथमिक शिक्षकों और मुख्याध्यापकों को 'श्वान गणना' (कुत्तों की गिनती) का काम सौंपा गया है। इस तुगलकी फरमान से शिक्षकों में आक्रोश की लहर है। उनका कहना है कि "हम छात्रों का भविष्य संवारें या गलियों में कुत्ते गिर्ने?" शिक्षकों को जनगणना और पशु गणना जैसे कामों में उलझाए रखने से सीधे तौर पर मासूम आदिवासियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।

समाधान या सिर्फ खानापूर्ति ?

इस गंभीर बीमारी का इलाज करने के बजाय विभाग ने केवल 'बैंड-एड' लगाने का काम किया है। शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए आउटसोर्सिंग (बाहा स्रोत) का सहारा लेकर 1,791 पदों पर कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्तियां की गई है। लेकिन शिक्षाविदों ने चेतावनी दी है कि अस्थायी और कम वेतन पर रखे गए शिक्षक वह निष्ठा और गुणवत्ता कभी नहीं दे पाएंगे, जो एक स्थायी शिक्षक देता है। यह आदिवासियों की अगली पीढ़ी को अनिश्चितता के अंधेरे में धकेलने जैसा है।

'शून्य' शिक्षकों वाली कक्षाएं

सरकारी आंकड़ों के पीछे की हकीकत बेहद कड़वी है। कई आश्रमशालाएं ऐसी है जहां गणित और विज्ञान जैसे मुख्य विषयों के लिए साल भर से कोई विशेषज्ञ शिक्षक ही नहीं पहुंचा है। यहाँ छात्र स्कूल तो आते हैं, हाजिरी भी लगती है और मिड-डे मील भी मिलता है, लेकिन पूरे दिन छात्र केवल आपस में बातें कर या खेलकूद कर घर लौट जाते हैं। दुर्गम क्षेत्रों में होने के कारण वरिष्ठ अधिकारी भी यहां मुआयना करने से कतराते हैं, जिससे इन बच्चों की आवाज फाइलों के नीचे दबकर रह गई है।

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