

Nagpur Vidarbha Tiger Corridor Dispute: नागपुर महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ की 24वीं बैठक में तय किया गया था कि विदर्भ में बाघ गलियारों के निर्धारण और वन्यजीव मंजूरी के लिए केवल एनटीसीए की 2014 की रिपोर्ट और डिसीजन सपोर्ट सिस्टम के डेटा को ही आधार माना जाएगा।
इसे लेकर सिटी के वन्यजीव संरक्षणवादियों लैंडस्केप रिसर्च एंड कंजर्वेशन फाउंडेशन की निदेशक शीतल कोल्हे और सृष्टि पर्यावरण मंडल के सचिव उदयन पाटिल द्वारा हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई।
याचिका पर सोमवार को सुनवाई के बाद न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश राज वाकोडे ने पूरे मामले की जांच राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) को सौंप दी। साथ ही एनटीसीए को निर्देश दिया कि वह 3 महीने के भीतर राज्य वन्यजीव बोर्ड द्वारा लिए गए विवादास्पद फैसलों की वैधता पर अपना अंतिम निर्णय ले।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधि। नितिन पाध्ये ने अदालत को बताया कि राज्य वन्यजीव बोर्ड का यह निर्णय मनमाना है और यह एनटीसीए द्वारा 7 फरवरी 2023 को जारी किए गए दिशा-निर्देशों का सीधा उल्लंघन करता है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार एनटीसीए ने बाघ गलियारों के निर्धारण के लिए 6 मापदंड तय किए थे, जिनमें वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की 2016 और 2021 की विस्तृत रिपोर्ट, टाइगर कंजर्वेशन प्लान और अखिल भारतीय बाध अनुमान के नवीनतम डेटा शामिल थे।
आरोप लगाया गया कि नेशनल हाईवे सर्कल द्वारा प्रस्तावित परियोजनाओं को रास्ता देने के लिए राज्य वन्यजीव बोर्ड ने इन महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययनों की अनदेखी की और बैठक के अंतिम क्षणों में यह एजेंडा पास कर दिया। उनका यह भी दावा था कि डीएसएस एक अधूरी प्रणाली है जो केवल सूचना के उद्देश्य से है, कानूनी निर्णय लेने के लिए नहीं।
राज्य सरकार और राज्य वन्यजीव बोर्ड की ओर से पैरवी कर रहे महाधिवक्ता मिलिंद साठे ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि बैठक में पूरी प्रक्रिया और चर्चा का पालन किया गया था।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत कानूनी रूप से केवल 2014 की एनटीसीए रिपोर्ट (जिसमें 32 बाघ गलियारे शामिल हैं) और स्वीकृत टाइगर कंजर्वेशन प्लान ही वैधानिक दर्जा रखते हैं।
याचिकाकर्ताओं द्वारा बताए गए अन्य 6 मापदंड और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के अध्ययन केवल रणनीतिक संरक्षण योजना के लिए हैं और इनका इस्तेमाल अनिवार्य वन्यजीव मंजूरी देने के लिए कानूनी तौर पर नहीं किया जा सकता।
दोनों पक्षों की दलीलों के बाद कोर्ट ने कहा कि बाघ संरक्षण के लिए नीतियां बनाने, टाइगर रिजर्व को मंजूरी देने और निगरानी करने के लिए एनटीसीए एक सर्वोच्च वैधानिक राष्ट्रीय प्राधिकरण है।
हालांकि इस मामले में राज्य वन्यजीव बोर्ड के फैसले के संदर्भ में एनटीसीए ने अपना रुख स्पष्ट नहीं किया था। इसे देखते हुए यह मामला राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को भेजने के आदेश दिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई एक एक चुनौती और मुद्दे की एनटीसीए गहराई से जांच करेगा, एनटीसीए को हर एक चुनौती के लिए बाकायदा कारण दर्ज करने होंगे और राज्य वन्यजीव बोर्ड की 24वीं बैठक में लिए गए फैसले की वैधता तय करनी होगी।