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नीति बनी लेकिन GR का क्या? फडणवीस की कोशिशों को ‘चूना’ लगा रहे अधिकारी, दांव पर लगे कई MoU
- Written By: प्रिया जैस
Nagpur: निश्चित रूप से महाराष्ट्र प्रगतिशील राज्य है। योजनाएं बनती हैं, निवेश बढ़ता है लेकिन कुछ मामलों में यह प्रगति ‘धीमी’ पड़ जाती है। खासकर जिसमें ‘विदर्भ’ को ज्यादा लाभ मिलने की उम्मीद रहती है।

पेंच महाराष्ट्र (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Nagpur News: पर्यटन नीति के साथ भी कुछ ऐेसा ही हो रहा है। 11 जुलाई 2024 को पर्यटन नीति जारी की गई। नीति को प्रभावी बनाने के लिए कम से कम 7 अधिसूचनाएं (जीआर) जारी होना लाजमी था। एक वर्ष बाद भी ये जीआर अधिकारी नहीं निकाल पाए हैं। क्षेत्र से जुड़े लोगों ने कई बार इन मुद्दों को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के समक्ष उठाया है और वस्तुस्थिति बताई है। बावजूद अधिकारी ‘कुंडली’ मारकर बैठे हुए हैं। विदर्भ विकास की बात आते ही अधिकारी सुस्त पड़ जाते हैं।
कागजातों को हर टेबल पर रोक दिया जाता है, ताकि विदर्भ को इसका लाभ न मिल सके। 2016 में यही हुआ था, पर्यटन नीति आ गई थी लेकिन जीआर जारी नहीं हुआ था और इसमें 10 वर्ष का समय बर्बाद हो गया। अब पुन: उसी तौर तरीके को अपनाया जा रहा है। पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोग मंत्रालय का चक्कर काट-काटकर परेशान हो चुके हैं परंतु जीआर के रूप में उन्हें जवाब नहीं मिल रहा है, इसलिए क्षेत्र के लोग फिर एक बार उदासी की कगार पर पहुंचने लगे हैं।
7 जीआर हैं अहम
पॉलिसी को एक्टिव बनाने के लिए कम से कम 7 अधिसूचनाओं (जीआर) की जरूरत है लेकिन जीआर अब तक नहीं निकल पाए हैं। बाबूगिरी में फाइलें इधर से उधर भटक रही हैं। बाबुओं की इसी प्रवृत्ति के कारण विदर्भ पिछड़ता चला जा रहा है और मध्य प्रदेश बाजी मारता जा रहा है। 11 जुलाई को नीति लाने की फुर्सत तो मिली लेकिन इसे अमल में लाने के लिए कोई भी सरोकार नहीं दिखा रहा है।
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मुख्यमंत्री ने ली सुध
जानकारों ने बताया कि नीति से जुड़े जीआर जारी नहीं होने संबंधी बात मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाई गई है। मंगलवार को नागपुर दौरे के दौरान भी उनके समक्ष समस्या को उठाया गया। इसके बाद फडणवीस ने मुख्य सचिव से लेकर पर्यटन विभाग के सचिव तक से बात की और उन्हें जल्द से जल्द जीआर जारी करने का निर्देश दिया है। मुख्यमंत्री ने निर्देशों को एक सप्ताह के अंदर अमल में लाने की हिदायत भी दी है।
पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि पॉलिसी को अमल में लाने के लिए कम से कम 7 जीआर की जरूरत है। इसमें राजस्व, बिजली, उद्योग, फायर, वाटर सप्लाई, अर्बन डेवलपमेंट विभाग से जीआर निकलना है लेकिन अब तक केवल राजस्व विभाग एक जीआर निकाल पाया है जो नीति के प्रभावी होने के लिए अपर्याप्त है।
ग्रामीण भागों के विकास में बाधा
जंगल, बाघ, जल-जमीन होने के बाद भी विदर्भ का ग्रामीण हिस्सा खुशहाल और संपन्न नहीं हो पा रहा है। पास में लगा मध्य प्रदेश का हिस्सा फलफूल रहा है, जबकि उससे लगे क्षेत्र में यहीं के लोग जाने से कतराते हैं। मध्य प्रदेश के पेंच में आज के दौर में लगभग 90 से अधिक आलीशान और शानदार रिसोर्ट्स हैं, जबकि पेंच महाराष्ट्र में बमुश्किल 10 भी नहीं है।
पेंच मध्य प्रदेश में 5,000 लोगों के ठहरने की व्यवस्था हो सकती है, जबकि पेंच महाराष्ट्र में 1,000 लोग भी नहीं ठहर सकते हैं। इसका मूल कारण यह है कि मध्य प्रदेश ने बेहतरीन नीति बनाई है। उद्योगों को साथ लिया और उनकी जरूरतों को समझते हुए विकास की रूपरेखा तैयार की जो खवासा में झलकता है लेकिन पेंच, ताडोबा, बोर, नागझिरा, करांडला में इसकी झलक देखने को नहीं मिलती है।
कई एमओयू दांव पर
सूत्रों का कहना है कि ताड़ोबा में लगभग 35 और महाराष्ट्र पेंच में 15 रिसोर्ट्स लगाने के लिए लोग इच्छुक हैं। कई लोगों ने एमओयू तक कर लिए हैं। अब वे नीति के पूर्ण रूप से लागू होने का इंतजार कर रहे हैं लेकिन विलंब पर विलंब हो रहा है और लोगों की सहन शक्ति खत्म हो रही है। यही कारण है कि कुछ एमओयू पर ग्रहण लगने की जानकारी भी सामने आने लगी है। अगर समय पर कदम नहीं उठाए गए तो एक के बाद एक प्रोजेक्ट से हाथ धोना पड़ सकता है।
पोर्टफोलियो बदला, प्राथमिकता बदली
सूत्रों ने बताया कि पहले बीजेपी के पास पर्यटन मंत्रालय था, अब शिवसेना के पास आ गया है। शिवसेना की प्राथमिकता बदल गई है। मंत्री और मंत्रालय के अधिकारी इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। मुख्यमंत्री के बार-बार बोलने पर भी बातें नहीं सुनी जा रही हैं। राजनीति के चक्कर में जीआर फंस गया है।
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सभी जीआर के लिए की बात
नागपुर दौरे के दौरान जब सीएम को नीति की वास्तविकता के बारे में जानकारी दी गई तो वे गंभीर हुए और तल्काल फोन कर सभी अधिकारियों को एक सप्ताह के अंदर जीआर जारी करने को कहा है। हमें उम्मीद है कि इस बार शहरी विकास, विद्युत विभाग से संबंधी अहम जीआर जारी हो जाएंगे। कई जीआर तो मंत्री सहित अधिकारियों के हस्ताक्षर के साथ तैयार भी हैं।
इन्हें केवल जारी करना शेष रह गया है। मुझे उम्मीद है कि गति पकड़ेगी। जीआर जारी करने के लिए संगठन तमाम प्रयास कर रहे हैं। फाइलें भी अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। खुशखबरी मिल जाए तो बात अलग होगी।
– संजय गुप्ता, एआईडी सदस्य
समय पर निकले जीआर तो महत्व
नीति बन जाती है लेकिन प्रभावी नहीं होती। इस विलंब का सीधा असर विकास पर पड़ता है। सरकार को एक बार गंभीरता से विचार करना होगा। यहीं के लोग हैं जो मजबूरी में मध्य प्रदेश में जाकर निवेश कर रहे हैं क्योंकि वहां की नीतियां अच्छी हैं। विदर्भ के गांव-गांव को आगे बढ़ाना है तो सरकार को तल्काल कदम उठाने होंगे और नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू कराने होंगे। इसी में विदर्भ का भी भला है।
– चंद्रपाल चौकसे, पर्यटन मित्र
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