
Uddhav Thackeray On India US Trade Deal (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Uddhav Thackeray Saamana Editorial: शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने गुरुवार को भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर चौतरफा हमला बोला है। अपने मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में पार्टी ने इस समझौते को केवल एक व्यापारिक करार नहीं, बल्कि भारतीय किसानों और मजदूरों के खिलाफ “युद्ध की घोषणा” करार दिया। उद्धव ठाकरे खेमे का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में आकर देश के खाद्य उत्पादकों की आजीविका को खतरे में डाल दिया है। संपादकीय में कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए सवाल उठाया गया कि क्या प्रधानमंत्री भारत के हितों की रक्षा कर रहे हैं या अमेरिका के लिए “बिक्री एजेंट” के रूप में काम कर रहे हैं।
यह आलोचना ऐसे समय में आई है जब घरेलू अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव में है। संपादकीय में उल्लेख किया गया कि जनवरी के अंत में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर 92 पर पहुँच गया था। इसके बावजूद, सरकार इस समझौते को एक महान उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, जिसे शिवसेना ने देश की संप्रभुता के साथ समझौता बताया है।
सामना संपादकीय में कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले विनाशकारी प्रभावों की चेतावनी दी गई है। प्रस्तावित “शून्य शुल्क” (Zero Duty) व्यवस्था के तहत, अमेरिका से आने वाले रियायती और सस्ते उत्पाद भारतीय बाजारों में भर जाएंगे। कपास, दूध, सोयाबीन, मक्का, बादाम, अखरोट और फलों जैसे उत्पादों पर शुल्क हटने से वे घरेलू उत्पादों की तुलना में काफी सस्ते हो जाएंगे। ठाकरे खेमे का दावा है कि इससे भारतीय किसान और कृषि श्रमिक प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।
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सामना ने दावा किया कि इस समझौते के तहत भारत कथित तौर पर रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा और पूरी तरह से 500 अरब डॉलर मूल्य के अमेरिकी तेल आयात पर निर्भर हो जाएगा। टैरिफ के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए संपादकीय में कहा गया कि भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ भले ही कम हो, लेकिन भारत पर प्रभावी टैरिफ का बोझ 3.31 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत हो जाएगा। विपक्ष के नेता राहुल गांधी के हवाले से दावा किया गया कि यह समझौता पिछले चार महीनों से रुका हुआ था, लेकिन अचानक ट्रम्प के “डर” में आकर इस पर हस्ताक्षर कर दिए गए।
संपादकीय में केंद्र सरकार पर आरोप लगाया गया है कि एक तरफ भारतीय किसान कर्ज के कारण आत्महत्या कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार “विदेशी उत्पादों के लिए लाल कालीन” बिछा रही है। शिवसेना (UBT) ने मांग की है कि प्रधानमंत्री को भारतीय किसानों के हितों और राष्ट्रीय संप्रभुता का बलिदान करने के बाद पद पर रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। भाजपा ने जहाँ इस डील को 1.4 अरब भारतीयों के लिए “शानदार घोषणा” बताया है, वहीं विपक्ष इसे देश के आर्थिक भविष्य के लिए एक निराशाजनक अध्याय मान रहा है।






