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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव: किसी सीट पर कोई रिस्क नहीं, सभी पार्टियों की एक ही नीति
आगामी विधानसभा चुनाव की घोषणा कभी भी हो सकती है। चुनाव आयोग अपनी तैयारी पूरी कर चुका है और मुख्य चुनाव आयुक्त जिला चुनाव अधिकारियों से बैठकें लेकर तैयारियों की समीक्षा कर रहे हैं। वहीं सभी राजनीतिक पार्टियां भी जो दो मुख्य गठबंधनों के रूप में आमने-सामने होंगी, की सीटों के बंटवारे की कवायद जारी है।
- Written By: शुभम सोनडवले

(डिजाइन फोटो)
नागपुर. आगामी विधानसभा चुनाव की घोषणा कभी भी हो सकती है। चुनाव आयोग अपनी तैयारी पूरी कर चुका है और मुख्य चुनाव आयुक्त जिला चुनाव अधिकारियों से बैठकें लेकर तैयारियों की समीक्षा कर रहे हैं। वहीं सभी राजनीतिक पार्टियां भी जो दो मुख्य गठबंधनों के रूप में आमने-सामने होंगी, की सीटों के बंटवारे की कवायद जारी है। महाविकास आघाड़ी (मविआ) की सत्ता ढाई वर्ष में पलटकर सत्ता की कुर्सी हासिल करने वाली महायुति किसी भी हालत में दोबारा अपनी सरकार लाने के लिए तो मविआ अपनी छीनी हुई सत्ता हासिल करने के लिए अपनी रणनीतियां बना रही हैं। इस चुनाव में एक-एक सीट पर दोनों ओर से गहरा चिंतन व अध्ययन (सर्वे) हो रहा है। कोई किसी भी सीट पर किसी तरह का प्रयोग कर रिस्क नहीं लेना चाहता। इस एक स्पष्ट नीति पर सभी चलते नजर आ रहे हैं। चुनाव पूर्व आ रहे सर्वेक्षणों में मविआ को झुकता माप मिलते देख इस खेमे में जहां उत्साह बढ़ता जा रहा है वहीं महायुति भी सतर्क होती जा रही है।
सावनेर, काटोल होंगी हॉट सीटें
जिले की 6 सीटों में से बीजेपी को बीते चुनाव में केवल कामठी व हिंगना में ही जीत मिली थी जबकि उसने 2014 के चुनाव में सावनेर को छोड़ शेष 5 सीटों में अपना परचम लहराया था। तीन सीटें उसके हाथ से निकल गई थीं। उमरेड में कांग्रेस व काटोल में राकां ने वापसी की थी। फिलहाल रामटेक के निर्दलीय विधायक आशीष जायसवाल महायुति में शिवसेना शिंदे गट की ओर से शामिल हैं। उन्हें मिलाकर जिले की तीन सीटें महायुति और 3 सीटें मविआ के पास हैं। मामला फिफ्टी-फिफ्टी का है। सावनेर सीट से कांग्रेस के सुनील केदार यह चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। इसलिए बीजेपी इस सीट पर विशेष ध्यान दे रही है। वह केदार के गढ़ में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है।
वहीं काटोल से राकां शरद पवार पार्टी के विधायक अनिल देशमुख अधिक आक्रामकता से सामने आए हैं। चर्चा यह थी कि इस सीट से उनके पुत्र सलिल देशमुख को उतारा जा सकता है लेकिन पार्टी के ही पदाधिकारियों का मानना है कि किसी तरह का रिस्क नहीं लेते हुए पार्टी अनिल देशमुख को ही इस सीट पर रिपीट करेगी। सावनेर सीट से केदार की जगह कौन उम्मीदवार होगा, इस पर अब तक सस्पेंस है। उनके समर्थकों का मानना है कि वे जिस कार्यकर्ता पर हाथ रख दें उसे चुनकर ला सकते हैं मगर कयास लग रहे हैं कि उनके परिवार का कोई सदस्य ही इस सीट का दावेदार होगा।
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कामठी, हिंगना में बदलेगा समीकरण
कयास लग रहे हैं कि बीजेपी कामठी में और राकां एसपी हिंगना में नो रिस्क नीति के चलते समीकरण बदल सकती है। सूत्र बताते हैं कि आरएसएस के चल रहे अंदरूनी सर्वे में डेंजर जोन में कामठी, सिटी की दो सीटों मध्य व दक्षिण नागपुर को रखा गया है। कामठी के संदर्भ में कुछ अलग कारण हैं तो सिटी की उक्त दो सीटों में बीते चुनाव में जीत का मामूली वोटों का अंतर है। ऐसी सूरत में जीत की गारंटी वाले चंद्रशेखर बावनकुले अपनी परंपरागत सीट कामठी से मैदान में उतारे जा सकते हैं। बीते चुनाव में उनकी टिकट कटने के बाद टेकचंद सावरकर को टिकट दी गई थी और वे विधायक हैं। कांग्रेस के सुरेश भोयर ने उन्हें करारी टक्कर दी थी और केवल 11,116 वोटों से ही चूके थे। बीजेपी इस बार रिस्क नहीं लेना चाहेगी। वहीं हिंगना सीट से समीर मेघे के खिलाफ पूर्व मंत्री रमेशचंद्र बंग को राकां एसपी उम्मीदवारी दे सकती। वे कुछ महीनों से काफी सक्रिय भी नजर आ रहे हैं। इस तरह मुकाबला एकतरफा न होकर कांटे का बन सकता है।
रामटेक एकतरफा, उमरेड में सस्पेंस
रामटेक का गणित ही अलग रहा है। संयुक्त शिवसेना के आशीष जायसवाल विधायक रहे। फिर 2014 की मोदी लहर में वे बीजेपी के मल्लिकार्जुन रेड्डी से हार गए। 2019 के चुनाव में शिवसेना ने उन्हें टिकट नहीं दी तो निर्दलीय लड़े और रेड्डी को पराजित कर दिया। फिर वे उद्धव ठाकरे के करीब गए लेकिन अधिकृत रूप से शिवसेना में शामिल नहीं हुए। शिवसेना की दो फाड़ के बाद वे अब शिंद शिवसेना के साथ हैं लेकिन अभी भी अधिकृत शिवसैनिक नहीं हैं। इस सीट में उनकी एकतरफा वजनदारी बनी है और कहा जा रहा है कि उन्हें टक्कर देने की जोरदार तैयारी इस बार कांग्रेस ने कर रखी है।
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रामटेक लोकसभा सीट में केदार ने जिस रणनीति के तहत श्याम बर्वे को जीत दिलाई है उसके बाद पार्टी इस सीट पर दावा ठोक रही है। महकमे में चर्चा है कि विस चुनाव में अगर यूबीटी ने यह सीट कांग्रेस के लिए छोड़ी और पूर्व मंत्री राजेन्द्र मूलक को टिकट दी गई तो जायसवाल को कड़ी चुनौती दे सकते हैं। भीतरखाने चर्चा यह भी है कि अगर ‘छिपे हाथ’ का जायसवाल को सपोर्ट नहीं मिला तो कांग्रेस मात भी देने की स्थिति में है।
वहीं उमरेड में तो कांग्रेस विधायक राजू पारवे के लोकसभा चुनाव में पार्टी बदलने के बाद से सीट बिना विधायक की है। लोस में हार के बाद भाजपा का पूरा दबाव होगा कि यह सीट अब उसे मिले। कोई नया प्रयोग न करते हुए बीजेपी अपने पूर्व विधायक सुधार पारवे को दोबारा मौका दे सकती है। कांग्रेस ने इस सीट के लिए फिलहाल कोई चेहरा सामने नहीं लायी है लेकिन वह भी जीतने के सक्षम उम्मीदवार को ही आगे करेगी, यह तय है।
Maharashtra assembly elections no risk on any seat all parties have same policy
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