
अकोला महानगरपालिका (सोर्सः AI-सोशल मीडिया)
Akola Municipal Corporation Elections: अकोला महानगरपालिका की चुनावी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अब पूरे राजनीतिक माहौल के साथ नवनिर्वाचित पार्षदों की नजरें महापौर पद के आरक्षण ड्रा पर टिक गई हैं। शहर का प्रथम नागरिक बनने वाले इस मानद पद के लिए कौन सा प्रवर्ग आरक्षित होगा, इसे लेकर उत्सुकता चरम पर है। राज्य सरकार के नगर विकास विभाग मंत्रालय में 22 जनवरी की सुबह 11 बजे यह ड्रा निकालने वाला है।
इस प्रक्रिया के बाद ही अकोला मनपा का सत्ता समीकरण स्पष्ट होगा। विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी, जिसने सर्वाधिक 38 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आयी है, सत्ता स्थापना और अपने पसंदीदा उम्मीदवार को महापौर बनाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयासरत है। लेकिन आरक्षण का स्वरूप कैसा होगा, इस पर कई दिग्गज इच्छुकों का राजनीतिक भविष्य निर्भर है।
गुरुवार को होने वाले ड्रा के बाद अकोला का राजनीतिक चित्र साफ होगा और सत्ता स्थापना की दिशा तय होगी। महापौर पद का आरक्षण न केवल शहर की राजनीति बल्कि कई नेताओं के भविष्य को भी प्रभावित करेगा। महिलाओं का वर्चस्व जारी रहेगा या पुरुष उम्मीदवारों को मौका मिलेगा, यह देखने के लिए पूरे शहर की निगाहें इस ड्रा पर टिकी हैं।
2002-2005- सुमन गावंडे नामाप्र (महिला)
2005-2007- अश्विनी हातवलणे सर्वसाधारण
2007-2009- मदन भरगड नामाप
2009-2011- सुरेश पाटिल – सर्वसाधारण
2012-2014- ज्योत्स्ना गवई अ.जा. (महिला)
2014-2017- उज्वला देशमुख सर्वसाधारण (महिला)
2017-2019- विजय अग्रवाल सर्वसाधारण
2019-2022- अर्चना मसने नामाघ्र (महिला)
पिछले दो दशकों के इतिहास पर नजर डालें तो महापौर पद पर महिलाओं का दबदबा रहा है। 2002 से 2019 तक हुई आत महापौरों की नियुक्तियों में पांच बार महिलाओं ने पद संभाला है। 2002 में सुमन गावंडे पहली महिला महापौर बनीं और तब से महिलाओं का वर्चस्व कायम रहा, अब देखना है कि इस बार फिर महिला आरक्षण निकलता है या पुरुष उम्मीदवारों को अवसर मिलता है।
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इस चुनाव में भाजपा को 80 सदस्यीय सभागृह में 38 सीटें मिलीं। शिवसेना शिंदे गुट, राकांपा अजीत पवार गुट और महानगर विकास आघाडी के एक-एक पार्षद भाजपा के साथ होने से पार्टी का संख्याचल 41 तक पहुंच गया है। सूत्रों के अनुसार, भाजपा और अधिक संख्याबल जुटाने की कोशिशों में है।






