'महिला अछूत नहीं हो सकती', माहवारी पर सुप्रीम कोर्ट जज की दो टूक; सबरीमाला विवाद पर सरकार से तीखी बहस

Sabarimala Temple: जस्टिस वीबी नागरत्ना ने कहा कि मैं एक महिला के तौर पर कहूं तो माहवारी के तीन दिनों के दौरान हर महीने महिला को अछूत नहीं बनाया जा सकता। फिर चौथे दिन यह खत्म हो जाता है।
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सुप्रीम कोर्ट, (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Sabarimala Temple Women Entry Hearing: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर रोक के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने मंगलवार को सुनवाई की। इस दौरान पितृसत्तात्मक व्यवस्था का सवाल उठा तो केंद्र ने इसकी परिभाषा पर ही सवाल उठा दिया। केंद्र सरकार ने कहा कि पितृसत्ता की जो बात भारत में कही जाती है, वह सही नहीं है। सरकार ने कहा कि यह पश्चिमी देशों की अवधारणा है और इसे भारत के संदर्भ में जस का तस लागू नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि भारत में तो महिलाओं का दर्जा काफी ऊंचा और अलग है। उन्होंने कहा कि यहां महिलाओं को समान अधिकार हैं। इसके अलावा उन्हें और ऊंचा ही स्थान मिला है।

'भारत में हम महिलाओं का पूजा करते हैं'

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि भारत में महिलाओं को सिर्फ बराबरी का दर्जा नहीं है बल्कि उन्हें और ऊंचा स्थान मिलता है। कई ऐसे अदालत के फैसले हैं, जिनमें पितृसत्तात्मक समाज की बात की गई है और एक तरह के जेंडर स्टीरियोटाइप उनमें दिखता है। लेकिन भारत का मामला अलग है। भारत के समाज में हम महिलाओं की पूजा करते हैं। भारत के राष्ट्रपति हों, प्रधानमंत्री हों या फिर सुप्रीम कोर्ट के जज हों, सभी देवियों के आगे सिर झुकाते हैं। उनकी पूजा करते हैं। इसलिए भारत में पितृसत्ता की परिभाषा उस तरह से लागू नहीं होती, जैसी पश्चिमी देशों में है। भारत में उस तरह की भावना कभी रही ही नहीं।

'एक हिंस्से को पूजा का अधिकार नहीं'

सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह भी कहा कि पहले के फैसलों में मंदिरों के प्रवेश में भेदभाव की जब बात होती थी तो जातिगत आधार पर किसी को एंट्री ना मिलने को गलत माना जाता था। कभी भी लैंगिक आधार पर इस विषय को लेकर बात नहीं हुई। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से इतिहास के एक दौर में ऐसा हुआ कि हिंदू समाज के ही एक हिस्से को पूजा का अधिकार नहीं था। किंतु लैंगिक भेदभाव नहीं था। लेकिन बीते कुछ दशकों में ऐसी स्थिति बनी है कि हर मामले को लैंगिक नजरिए से देखा जाने लगा है। संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की बात करता है और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है। आर्टिकल 15 कहता है कि लैंगिक पहचान से इतर सभी के मूल अधिकार बराबर हैं।

सबरीमाला केस में 2018 के फैसले पर बहस

इसके साथ ही उन्होंने सबरीमाला केस (Sabarimala Temple) में 2018 के एक फैसले को लेकर भी आपत्ति जताई। तुषार मेहता ने कहा कि उस फैसले में महिलाओं को मंदिर में प्रवेश न मिलने की तुलना छुआछूत जैसी है। उन्होंने कहा कि भारत में पितृसत्तात्मक समाज की जो परिभाषा दी जाती है, वह पश्चिम से आई है। भारत में ऐसा नहीं है। इसलिए पश्चिम के नजरिए से देखना भी एक समस्या है। तुषार मेहता की इस टिप्पणी पर बेंच में शामिल इकलौती महिला जज नागरत्ना ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मैं महिला के नाते अपनी बात रखना चाहूंगी।

एकलौती महिला जज नागरत्ना ने क्या कहा?

जस्टिस वीबी नागरत्ना ने कहा कि मैं एक महिला के तौर पर कहूं तो माहवारी के तीन दिनों के दौरान हर महीने महिला को अछूत नहीं बनाया जा सकता। फिर चौथे दिन यह खत्म हो जाता है। यह कड़वी हकीकत है। एक महिला के तौर पर कहूं तो आर्टिकल 17 तीन दिन के लिए अप्लाई नहीं होता और फिर चौथे दिन कहा जाए कि अछूत वाली कोई बात ही नहीं है। फिर सबरीमाला (Sabarimala Temple) की बात हुई तो सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सबरीमाला मंदिर का मामला लैंगिक भेदभाव वाला नहीं है। यह मान्यता का विषय है और इसे उसी नजरिए से देखना चाहिए।

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