RSS के 100 साल पर भागवत का बड़ा संदेश, कहा- हमारा संकल्प भारत बनेगा विश्वगुरु

RSS चीफ भागवत ने देश में एकता का संदेश दिया। एकता के लिए एकरूपता की आवश्यकता को नकारते हुए उन्होंने कहा कि विविधता में एकता है और विविधता, एकता का ही परिणाम है।
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत (फोटो- सोशल मीडिया)
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RSS Cheaf Mohan Bhagwat News: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने 100 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है। इस ऐतिहासिक अवसर पर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने विज्ञान भवन में 'आरएसएस की 100 वर्ष यात्रा: नए क्षितिज' विषय पर एक कार्यक्रम में देश को एकजुटता का संदेश दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश में एकता के लिए एकरूपता जरूरी नहीं है। उनके अनुसार, विविधता में भी एकता है और यह विविधता एकता का ही परिणाम है। उन्होंने हिंदू धर्म को भौगोलिक और पारंपरिक रूपरेखा में परिभाषित करते हुए आरएसएस का उद्देश्य देश को 'विश्वगुरु' बनाना बताया।

भागवत ने यह भी कहा कि भारत आजादी के 75 साल बाद भी वह मुकाम हासिल नहीं कर सका, जो उसे मिलना चाहिए था। उन्होंने जोर दिया कि देश को आगे बढ़ाने के लिए सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता है, जिसमें हर नागरिक की अपनी भूमिका होगी। इस प्रक्रिया में सरकार और राजनीतिक दलों का काम सिर्फ मदद करना है। मुख्य परिवर्तन समाज की धीरे-धीरे प्रगति से ही आएगा। आरएसएस के राष्ट्रीय प्रचार एवं मीडिया प्रमुख सुनील आंबेकर ने बताया कि भागवत तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला के दौरान समाज के प्रमुख लोगों के साथ संवाद करेंगे।

एकता के लिए एकरूपता जरूरी नहीं

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि इस कार्यक्रम का विषय भौगोलिक नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति समर्पण और पूर्वजों की परंपरा है, जो सभी के लिए समान है। उन्होंने कहा कि "हमारा डीएनए भी एक है, सद्भावना से रहना हमारी संस्कृति है।" उन्होंने जोर देकर कहा कि हम एकता के लिए एकरूपता को जरूरी नहीं मानते, विविधता में भी एकता है, और विविधता एकता का ही परिणाम है। उनका यह संदेश देश के भीतर विभिन्न समुदायों के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर केंद्रित था।

हिंदू लड़ने वाले नहीं, साथ चलने वाले

आरएसएस प्रमुख ने 'हिंदू' शब्द को परिभाषित करते हुए कहा कि यह बाहरी लोगों द्वारा भारतीयों के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है। उन्होंने कहा कि हिंदू अपने मार्ग पर चलने और दूसरों का सम्मान करने में विश्वास रखते हैं। वे किसी मुद्दे पर लड़ने के बजाय समन्वय में विश्वास रखते हैं। प्राचीन काल से ही भारतीयों ने कभी लोगों के बीच भेदभाव नहीं किया, क्योंकि वे समझते थे कि सभी और पूरा विश्व एक ही दिव्यता से बंधा है। भागवत के इन विचारों ने आरएसएस के 100 साल के सफर और भविष्य की दिशा पर प्रकाश डाला। उनका मानना है कि भारत को 'विश्वगुरु' बनाने का समय आ गया है और इसमें हर भारतीय को अपनी भूमिका निभानी होगी।

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