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देश पर कुर्बान किया बचपन का प्यार, लौटाई सगाई की अंगूठी, बन गया ‘द्रास का टाइगर’
लैला मजनू और हीर रांझे की कहानियां आपको बखूबी याद होंगी, लेकिन देश प्रेम की खातिर अपने प्यार को कुर्बान करने वाले जांबाज कैप्टन अनुज नैयर की यह कहानी आपकी आंखें नम कर देगी।
- Written By: अभिषेक सिंह

कैप्टन अनुज नैयर (सोर्स- सोशल मीडिया)
‘ये अंगूठी रख लो…इसे मेरी मंगेतर को दे देना, अब मुझसे यह बोझ उठाया नहीं जाता’, अपने साथी को यह कहते हुए भारत मां का एक ‘वीर सिपाही’ दुश्मन को सबक सिखाने निकल पड़ा। लैला मजनू और हीर रांझे की कहानियां आपको बखूबी याद होंगी, लेकिन देश प्रेम की खातिर अपने प्यार को कुर्बान करने वाले जांबाज की यह कहानी आपकी आंखें नम कर देगी।
मां भारती के इस वीर सपूत ने आज ही के दिन दुश्मनों से मां के ‘आंचल’ की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। जब इस वीर सिपाही ने देश के लिए सीमा पर लड़ते हुए शहादत दी तो उम्र महज 24 साल थी। जिस लड़की को वह बचपन से चाहता था उसके साथ सगाई हो चुकी थी लेकिन…
हम बात कर रहे हैं कारगिल युद्ध के उस योद्धा की जिसे लोग ‘द्रास का टाइगर’ कहते हैं। इस जांबाज का नाम था अनुज नैयर। अनुज का जन्म 28 अगस्त 1975 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता प्रोफेसर थे और उनकी मां दिल्ली विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में काम करती थीं। बचपन से ही बहादुर और देशभक्त रहे अनुज का नाम भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
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बचपन की दोस्त के साथ सगाई
अनुज की मां ने एक मीडिया इंटरव्यू में बताया था कि उनके बेटे को उसके साथ पढ़ने वाली एक लड़की पसंद थी। दोनों की सगाई हो गई और शादी की तारीख भी तय हो गई। अनुज की शादी 10 सितंबर 1999 को होनी थी, लेकिन समय को कुछ और ही मंजूर था। 7 जुलाई 1999 को खबर आई कि अनुज शहीद हो गए।
‘द्रास का टाइगर’ अनुज नैयर
‘द्रास का टाइगर’ कैप्टन अनुज की जीवनी है। कैप्टन अनुज 1999 के कारगिल युद्ध में द्रास सेक्टर की सुरक्षा के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए थे। ‘द्रास का टाइगर’ किताब अनुज की मां मीना नैयर और हिम्मत सिंह शेखावत ने लिखी है। इस किताब में अनुज नैयर के देश प्रेम और प्रेम का एक ऐसा किस्सा लिखा गया है जिसे पढ़कर आपकी आंखें छलक जाएंगी।
कारगिल युद्ध 1999 (सोर्स- सोशल मीडिया)
क्यों उतारी थी सगाई की अंगूठी?
दुश्मन के खेमे में जाने से पहले अनुज ने अपनी सगाई की अंगूठी उतारकर अपने दोस्त को देते हुए कहा कि अगर वह युद्ध से जिंदा लौटता है तो वह अंगूठी वापस ले लेगा, लेकिन अगर वह शहीद होता है तो यह अंगूठी उसकी मंगेतर को दे दी जाए। वह नहीं चाहता था कि उसके प्यार की निशानी दुश्मन के हाथ लग जाए। दुख की बात यह है कि अनुज की शहादत के बाद वह अंगूठी भी उसके पार्थिव शरीर के साथ उसके घर पहुंच गई।
अनुज की बहादुरी और शहादत
तारीख 6 जुलाई 1999, 17वीं जाट बटालियन को प्वाइंट 4875 से दुश्मनों को खदेड़ने की जिम्मेदारी दी गई। टीम की कमान 24 वर्षीय कैप्टन अनुज के हाथों में थी। हर कदम पर मौत थी। दुश्मनों की संख्या का अंदाजा नहीं था, लेकिन कैप्टन का हौसला नहीं डगमगाया। टीम ऑपरेशन के लिए आगे बढ़ने लगी, लेकिन पाकिस्तानी घुसपैठियों की ओर से लगातार भारी गोलीबारी हो रही थी। हर चुनौती को पार करते हुए वह मंजिल के बेहद करीब पहुंच चुके थे।
कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन अनुज नैयर (सोर्स- सोशल मीडिया)
घायल अवस्था में उन्होंने एक के बाद एक 9 दुश्मनों को ढेर कर दिया। उन्होंने पाकिस्तान के चार तीन बड़े बंकरों में से तीन को नष्ट कर दिया। लेकिन चौथे बंकर को नष्ट करते समय दुश्मन के एक ग्रेनेड ने कैप्टन अनुज नैयर को बुरी तरह घायल कर दिया।
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गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने अपनी शेष टीम के साथ हमला जारी रखा। इस ऑपरेशन में उनकी टीम का कोई भी सदस्य जीवित नहीं बचा और कैप्टन अनुज नैयर भी शहीद हो गए। लेकिन दो दिन बाद चार्ली कंपनी के विक्रम बत्रा के नेतृत्व वाली टीम ने प्वाइंट 4875 पर फिर से नियंत्रण हासिल कर लिया।
मरणोपरांत मिला महावीर चक्र
7 जुलाई 1999, यही वो तारीख है जब अनुज के घर पर फोन की घंटी बजती है और उनके पिता प्रोफेसर नैयर को बताया जाता है कि ‘आज सुबह 5:30 बजे हमने देश की महान सेवा करते हुए अनुज को खो दिया युद्ध में उनकी अनुकरणीय बहादुरी के लिए कैप्टन अनुज नैयर को मरणोपरांत महावीर चक्र (भारत का दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार) से सम्मानित किया गया।
Captain anuj nayyar kargil martyrdom love sacrifice drass tiger story
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