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जयंती विशेष: कौन थे हरचंद सिंह लोंगोवाल? राजीव गांधी के साथ किया ऐसा समझौता…जो बन गया मौत की वजह
Harchand Singh Longowal: देश आज हरचंद सिंह लोंगोवाल की 94वीं जयंती मना रहा है। लेकिन इस बीच वो सवाल आज भी ताजा हैं कि साल 1985 में आखिर ऐसा क्या हुआ था, जिसकी वजह से उनकी हत्या कर दी गई।
- Written By: अभिषेक सिंह

हरचंद सिंह लोंगोवाल (सोर्स- सोशल मीडिया)
Birth Anniversary Special: भारत के राजनीतिक इतिहास में पंजाब का 80 का दशक काले अक्षरों में दर्ज है। उस दौर में जब पंजाब आतंकवाद और अलगाववाद की आग में जल रहा था, तब एक शख्स ऐसा भी था जिसने शांति की उम्मीद जगाई थी। वो शख्स थे अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगोवाल। उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ मिलकर ऐतिहासिक ‘पंजाब समझौता’ किया, लेकिन यही समझौता उनकी मौत का कारण बन गया।
देश आज यानी शुक्रवार 2 जनवरी को हरचंद सिंह लोंगोवाल की 94वीं जयंती मना रहा है। लेकिन इस बीच वो सवाल आज भी ताजा हैं कि साल 1985 में आखिर ऐसा क्या हुआ था, जिसकी वजह से उनकी हत्या कर दी गई। तो आइए जानते हैं हरचंद सिंह लोंगोवाल कौन थे और उनकी हत्या कैसे हुई…
कौन थे हरचंद सिंह लोंगोवाल?
हरचंद सिंह लोंगोवाल का जन्म 2 जनवरी 1932 को पंजाब के संगरूर जिले के गदरियानी गांव में हुआ था। उनका व्यक्तित्व शुरू से ही धार्मिक था। बहुत कम उम्र में ही वे दामदमा साहिब टकसाल से जुड़ गए और कीर्तन करने लगे। उनकी सादगी और धार्मिक स्वभाव के कारण लोग उन्हें ‘संत’ कहकर बुलाने लगे। बाद में वे शिरोमणि अकाली दल की राजनीति में सक्रिय हुए। अपनी मृदुभाषी शैली और सबको साथ लेकर चलने की क्षमता के कारण वे 1980 में अकाली दल के अध्यक्ष बने।
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धर्मयुद्ध मोर्चा का किया संचालन
यह वह दौर था जब पंजाब में चरमपंथ अपने चरम पर था और जरनैल सिंह भिंडरावाले का प्रभाव बढ़ रहा था। लोंगोवाल नरमपंथी विचारधारा के थे। उन्होंने स्वर्ण मंदिर से ‘धर्म युद्ध मोर्चा’ का संचालन किया, लेकिन वे हिंसा के सख्त खिलाफ थे। 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद हुई इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पंजाब के हालात बेहद नाजुक थे।
किस समझौते ने बदली दिशा?
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, तो उनकी प्राथमिकता पंजाब में शांति बहाल करना थी। उन्होंने जेल में बंद अकाली नेताओं को रिहा किया, जिनमें लोंगोवाल भी शामिल थे। रिहाई के बाद लोंगोवाल ने साहस दिखाते हुए केंद्र सरकार से बातचीत का रास्ता चुना, जबकि चरमपंथी इसके सख्त खिलाफ थे।
राजीव गांधी व हरचंद सिंह लोंगोवाल (सोर्स- सोशल मीडिया)
24 जुलाई 1985 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री राजीव गांधी और हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे ‘राजीव-लोंगोवाल समझौता’ या ‘पंजाब एकॉर्ड’ कहा जाता है। इस समझौते के तहत चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने जल विवाद को सुलझाने और सिखों की कई धार्मिक मांगों को मानने पर सहमति बनी। इस समझौते ने देश को उम्मीद दी कि अब पंजाब में खून-खराबा रुक जाएगा।
एक महीने के अंदर हो गई हत्या
राजीव-लोंगोवाल समझौता चरमपंथियों (खालिस्तान समर्थकों) को रास नहीं आया। वे लोंगोवाल को ‘कौम का गद्दार’ मानने लगे। समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक महीने से भी कम समय के भीतर, 20 अगस्त 1985 को पंजाब के लिए वह काला दिन आया।
कैसे की गई लोंगोवाल की हत्या?
संत लोंगोवाल संगरूर जिले के शेरपुर गांव के एक गुरुद्वारे में समर्थकों को संबोधित कर रहे थे। वह हाथ जोड़कर संगत का अभिवादन कर रहे थे, तभी भीड़ में छिपे हथियारबंद चरमपंथियों ने उन पर गोलियां बरसा दीं। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस हमले में उनकी जान चली गई।
यह भी पढ़ें: जन्मदिन विशेष: वो कांग्रेसी जिसने मध्य प्रदेश में BJP को कर दिया अजेय, PM मोदी ने दिया रिटर्न गिफ्ट
हरचंद सिंह लोंगोवाल की हत्या न केवल एक नेता की हत्या थी, बल्कि यह पंजाब में शांति के प्रयासों पर एक बड़ा हमला थी। उनकी शहादत ने यह साबित किया कि शांति का रास्ता कितना मुश्किल हो सकता है। आज भी उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाता है, जिसने बंदूकों के साये में अमन का फूल खिलाने की कोशिश की और अपनी जान की बाजी लगा दी।
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