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जन्मदिन विशेष: जब राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी की चुनावी समरभूमि पर उतरीं थी मेनका गांधी, जानिए क्या थे कारण?
सोमवार 26 अगस्त को मेनका गांधी अपना 68वां जन्मदिन मना रही हैं। चारों ओर से उन्हें शुभकामनाएं दी जा रही हैं।
- Written By: अभिषेक सिंह

नन्हे वरुण गांधी के साथ मेनका गांधी (सोर्स-सोशल मीडिया)
नवभारत डेस्क: सोमवार 26 अगस्त को मेनका गांधी अपना 68वां जन्मदिन मना रही हैं। चारों ओर से उन्हें शुभकामनाएं दी जा रही हैं। सियासी सफे पर जब भी गांधी परिवार के सियासत दानों का जिक्र आता है तो मेनका गांधी का नाम सोनिया से पहले आता है। क्योंकि भले ही मेनका ने पहला चुनाव राजीव गांधी के खिलाफ ही लड़ा था लेकिन सच तो यही है कि उन्होंने सोनिया गांधी से पहले मेनका गांधी भारतीय चुनाव सियासी समरभूमि में उतरीं थी।
1984 का साल था। कांग्रेस पार्टी के लिए वह साल काफी मुश्किल भरा था। 31 अक्टूबर 1984 को देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी की उनके ही अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी। इसके बाद राजीव गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। राजीव तब दुखों के पहाड़ में दब गए थे। उनके पास खुद के लिए और अपनों के लिए भी समय नहीं था। पार्टी नेताओं ने उन्हें आम चुनाव कराने की सलाह दी। वे इंदिरा गांधी की हत्या की सहानुभूति को चुनावों में भुनाना चाहते थे। राजीव भी तब तक समझ चुके थे कि वे चुनाव उनके लिए इतने महत्वपूर्ण क्यों थे?
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1984 के आम चुनाव न केवल पीएम के तौर पर उनकी वैधता साबित करने के लिए जरूरी थे बल्कि यह उनके लिए राजनीतिक विरासत की बड़ी लड़ाई भी थी। आखिरकार उन्होंने 26 दिसंबर 1984 को चुनाव कराने की तारीख तय की। उस समय वे अमेठी से सांसद थे। राजीव पहली बार 1981 में अपने छोटे भाई संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत के बाद इस सीट पर हुए उपचुनाव में इस सीट से सांसद बने थे। राजीव चाहते थे कि सोनिया गांधी उनके साथ अमेठी निर्वाचन क्षेत्र में प्रचार के लिए जाएं, जहां मेनका गांधी अपने छोटे बेटे वरुण गांधी को गोद में लेकर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रही थीं।
संजय की विरासत संभालना चाहती थीं मेनका
जेवियर मोरो की किताब ‘द रेड साड़ीज’ के मुताबिक सोनिया गांधी सिर्फ मेनका की भाभी ही नहीं थीं, बल्कि देश के प्रधानमंत्री की पत्नी भी थीं। वह उस भूमिका को चुनने में काफी असहज थीं, जो ज्यादातर महिलाओं के लिए गर्व और संतुष्टि की बात हो सकती है। जेवियर मोरो ने लिखा है कि राजीव गांधी के इस प्रस्ताव से सोनिया गांधी दुखी थीं। दरअसल, संजय गांधी की मौत के बाद मेनका गांधी उस सीट से चुनाव लड़ना चाहती थीं, लेकिन इंदिरा गांधी ने पार्टी नेताओं की सलाह पर राजीव गांधी को इस सीट से चुनाव लड़ाकर राजनीति में प्रवेश कराया।
1984 में सड़क पर आई अंदरूनी लड़ाई
कहा जाता है कि कई साधु-संतों ने इंदिरा गांधी को सलाह दी थी कि वह राजीव को विमान न उड़ाने दें (राजीव उस समय एयर इंडिया के पायलट थे)। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद गांधी-नेहरू परिवार की अंदरूनी लड़ाई सड़कों पर आ गई और 1984 के लोकसभा चुनाव में मेनका गांधी ने खुली जंग का ऐलान कर दिया। तब उनके एक समर्थक ने कहा था कि मेनका की लड़ाई एक सांसद से नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री से है।
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इस पारिवारिक लड़ाई में अमेठी के घर की हर एक दीवार, चाहे वो मिट्टी की बनी हो या ईंट की, राजीव गांधी के पक्ष में लिखे गए नारों से पटी हुई थीं। उन दीवारों पर लिखा गया था- आपका दाहिना हाथ राजीव है, अमेठी का नाम विकास है, विकास का नाम राजीव है और विकास के साथ चलो, राजीव के साथ चलो। आखिरकार चुनाव में राजीव गांधी ने अपने ही छोटे भाई की पत्नी मेनका गांधी को 4 लाख 46 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से हरा दिया।
Birthday special when maneka gandhi entered the electoral battlefield of amethi against rajiv gandhi
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