सेवा के वादों के बीच विरासत की जंग: नासिक चुनाव में परिवारवाद हावी; कार्यकर्ता पीछे, परिजन आगे!

Family Politics: नासिक महानगरपालिका चुनाव में इस बार परिवारवाद का असर साफ दिखाई दे रहा है। कुल 323 उम्मीदवारों में से 60 प्रत्याशी राजनीतिक रसूखदार परिवारों से जुड़े हैं, जिनमें भाजपा की संख्या सबसे अ
A battle for legacy amidst promises of service: Family politics dominates the Nashik elections; party workers take a backseat, while family members come to the forefront!
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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Nashik Municipal Election: नासिक महानगरपालिका चुनाव का रण अब पूरी तरह सज चुका है और इस बार के चुनावी समर में 'परिवारवाद' का रंग काफी गहरा नजर आ रहा है। लोकतंत्र के इस उत्सव में जनता की सेवा के दावों के बीच अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने की जद्दोजहद साफ दिखाई दे रही है।

मैदान में डटे कुल 323 उम्मीदवारों में से 60 प्रत्याशी ऐसे हैं, जो किसी न किसी राजनीतिक रसूख वाले परिवार से ताल्लुक रखते हैं। कहीं बेटा पिता की विरासत संभाल रहा है, तो कहीं बहू और पत्नी चुनावी मैदान में ताल ठोक रही हैं।

दिलचस्प बात यह है कि पारिवारिक उम्मीदवारों की सबसे लंबी फेहरिस्त भारतीय जनता पार्टी में देखने को मिल रही है, जिसने वफादार कार्यकर्ताओं के बजाय 'नेताओं के परिजनों' पर अधिक भरोसा जताया है।

पूर्व महापौर और दिग्गजों के परिजन मैदान में

चुनावी बिसात पर पूर्व महापौर रंजना भानसी, नयना घोलप और अशोक मुर्तडक स्वयं मोर्चा संभाले हुए हैं। इनके अलावा कई दिग्गजों ने अपनी अगली पीढ़ी को राजनीति में स्थापित करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी हैः विनायक पांडे (पूर्व महापौर): इनकी बहू अदिति पांडे चुनावी मैदान में अपना भाग्य आजमा रही हैं।

वसंत गीते (पूर्व विधायक व महापौर): इनके दोनों पुत्र प्रथमेश और प्रवीण गीते अलग-अलग प्रभागों से चुनाव लड़ रहे हैं। बालासाहेब सानपः कद्दावर नेता सानप के पुत्र मयूर सानप की प्रतिष्ठा भी इस चुनाव में दांव पर लगी है।

डॉ. यतीन वाघः पूर्व महापौर वाघ की पत्नी हिना वाघ चुनावी समर में उतरी हैं। सतीश कुलकर्णीः पूर्व महापौर कुलकर्णी की पुत्री संध्या भी चुनावी किस्मत आजमा रही हैं।

वोट के लिए छात्रों और शिक्षकों का इस्तेमाल

पुराना नासिक(प्रभाग 14) में एक ऐसा गंभीर विवाद खड़ा हो गया है जिसने चुनावी शुचिता पर सवाल उठा दिए हैं। पूर्व पार्षद मुशीर सैय्यद ने एक प्रतिष्ठित उर्दू माध्यम शिक्षण संस्थान पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए एक वीडियो और कॉल रिकॉर्डिंग वायरल की है।

आरोप है कि संस्थान के चेयरमैन को चुनाव जिताने के लिए शिक्षक, अभिभावकों को फोन कर उन पर दबाव बना रहे हैं और वोटर आईडी कार्ड की मांग कर रहे हैं। वायरल क्लिप में एक शिक्षिका कथित तौर पर कह रही है कि 'आपका नाम लिस्ट में शामिल कर लिया जाएगा'।

इस खुलासे के बाद शिक्षा जगत और राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया है कि क्या चेयरमैन की कुर्सी के लिए मासूम छात्रों के भविष्य और गुरु-शिष्य परंपरा का इस्तेमाल किया जा रहा है?

मेरे आवेदन पर न तो प्रस्तावक था और न ही अनुमोदक, इसके बावजूद उसे मंजूरी देना प्रशासन की गंभीर चूक है। अधिकारी अपनी गलती छिपाने के लिए तकनीकी नियमों का हवाला दे रहे हैं। मैं इसकी शिकायत उच्च स्तर पर करूंगी।

निर्दलीय उम्मीदवार (घोषित) - प्रतिमा भोसले

मैंने पर्चा भरा ही नहीं, फिर उम्मीदवार कैसे बनी ?

मालेगांव के प्रभाग 10 'क' से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यहां प्रतिमा भोसले को निर्दलीय उम्मीदवार घोषित कर चुनाव चिहन भी आवंटित कर दिया गया है, जबकि उनका दावा है कि उन्होंने आधिकारिक तौर पर कोई नामांकन पत्र दाखिल ही नहीं किया।

प्रतिमा भोसले का पक्ष रमै भाजपा से टिकट चाहती थी, लेकिन 'एबी फॉर्म' न मिलने पर मैं निराश थी। मैंने आवेदन पत्र और दस्तावेज टेबल पर ही छोड़ दिए थे।

न मैंने कोई साइन किए और न ही रजिस्टर में एंट्री हुई, बिना प्रस्तावक और अनुमोदक के मेरा आवेदन वैध कैसे मान लिया गया? यह प्रशासन की बड़ी लापरवाही है।

निर्वाचन निर्णय अधिकारी ने अपना बचाव करते हुए कहा कि आवेदन चुनाव कक्ष में मिला था और सभी दस्तावेज तकनीकी रूप से सही पाए गए, नियमों के अनुसार इसे खारिज नहीं किया जा सकता था। यदि उम्मीदवार को चुनाव नहीं लड़ना था, तो उन्हें आवेदन वापस ले जाना चाहिए था या समय रहते नाम वापस लेना चाहिए था।

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