
डायबिटीज मरीज की जांच करता डॉक्टर
Diabetes Treatment Cost: दुनिया की हर 10 में से 1 वयस्क आबादी डायबिटीज का शिकार है। IIASA और वियना यूनिवर्सिटी की ताजा रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि डायबिटीज का वैश्विक आर्थिक बोझ 152 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है जिसमें अमेरिका के बाद भारत पर सबसे अधिक वित्तीय दबाव देखा जा रहा है।
डायबिटीज मेलिटस अब केवल एक बीमारी नहीं बल्कि एक वैश्विक आर्थिक संकट का रूप ले चुकी है। वियना यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस और IIASA के विशेषज्ञों द्वारा 204 देशों पर की गई एक विस्तृत स्टडी में डराने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इस रिसर्च के मुताबिक 2020 से 2050 के बीच डायबिटीज का कुल वैश्विक आर्थिक बोझ दुनिया की सालाना जीडीपी का लगभग 1.7 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले आंकड़े भारत को लेकर हैं। अनुमान है कि भारत में डायबिटीज का कुल आर्थिक असर करीब 11.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। इस सूची में अमेरिका 16.5 ट्रिलियन डॉलर के साथ पहले स्थान पर है जबकि चीन 11 ट्रिलियन डॉलर के साथ तीसरे नंबर पर है। यह स्थिति भारत के लिए चिंताजनक है क्योंकि यहां मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे स्वास्थ्य बजट पर भारी दबाव है।
डायबिटीज चेक कराते हुए मरीज (सौ. फ्रीपिक)
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स्टडी में एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है इनफॉर्मल केयर। जब परिवार के सदस्यों द्वारा की जाने वाली देखभाल और समय के नुकसान को जोड़ा जाता है तो लागत कई गुना बढ़ जाती है। रिपोर्ट बताती है कि कुल आर्थिक बोझ का 85% से 90% हिस्सा इसी इनफॉर्मल देखभाल से जुड़ा है। इसका मुख्य कारण यह है कि डायबिटीज में मरीजों की संख्या मौतों की संख्या से 30 से 50 गुना ज्यादा होती है जिससे लंबे समय तक देखभाल की जरूरत पड़ती है।
रिसर्च में यह भी उजागर हुआ है कि हाई-इनकम देशों में इलाज की लागत कुल बोझ का 41% है जबकि कम आय वाले देशों में यह केवल 14% है। IIASA के विशेषज्ञ माइकल कुहन के अनुसार, यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि आधुनिक और बेहतर इलाज की सुविधाएं आज भी मुख्य रूप से अमीर देशों तक ही सीमित हैं। गरीब देशों में मरीज इलाज के अभाव में काम करने की क्षमता खो देते हैं जिससे वहां प्रोडक्टिविटी लॉस अधिक होता है।
डायबिटीज को लेकर यह चेतावनी सरकारों के लिए है कि अगर रोकथाम पर निवेश नहीं किया गया तो आने वाले दशकों में यह बीमारी न केवल स्वास्थ्य सेवाओं को बल्कि देशों की जीडीपी को भी बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचा सकती है।






