
सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर (इमेज-सोशल मीडिया)
Siddhant Chaturvedi Mrunal Thakur Film: अगर ग्लोबल एंटरटेनमेंट की बात करें, तो भारत हमेशा दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलता आया है। आज जब पूरी दुनिया कोरियन ड्रामा यानी के-ड्रामा की दीवानी हो चुकी है, उसी दौर में भारत भी अपनी एक सॉफ्ट, सेंसिटिव और दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानी लेकर आ रहा है ‘दो दीवाने सहर में’। यही वजह है कि इसे बेझिझक भारत की अपनी के-ड्रामा कहा जा सकता है।
भारत में प्रेम कहानियों की कोई कमी नहीं रही, लेकिन ‘दो दीवाने सहर में’ प्यार को एक अलग ही नज़रिए से पेश करती है। यह फिल्म न तो बड़े ड्रामे पर टिकी है और न ही किसी बाहरी विलेन पर। यहां टकराव भावनाओं का है, उलझनों का है और उन खामोश लम्हों का है, जो अक्सर रिश्तों में सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं। यह फिल्म हल्की-फुल्की, सुकून देने वाली और बेहद ‘फील-गुड’ है ठीक वैसी, जैसी के-ड्रामा की प्रेम कहानियां होती हैं।
आज भारतीय दर्शक बड़ी संख्या में के-ड्रामा देख रहे हैं। भावनाओं की गहराई और रिश्तों की सादगी की सबसे बड़ी वजह है। ‘दो दीवाने सहर में’ भी उसी एहसास को पकड़ती है। यह फिल्म प्यार को किसी परीकथा की तरह नहीं, बल्कि एक एहसास की तरह दिखाती है कि जो नर्म है, उलझा हुआ है और धीरे-धीरे बदलता है। शहर की भागदौड़ के बीच, ट्रेलर दो ऐसे लोगों से मिलवाता है जो एक-दूसरे को बदलने नहीं, बल्कि समझने की कोशिश करते हैं।
सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर की जोड़ी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। दोनों के बीच का रिश्ता किसी तेज़ रफ्तार रोमांस की बजाय एक स्लो-बर्न लव स्टोरी की तरह आगे बढ़ता है। के-ड्रामा की तरह यहां भी रिश्ता नर्म है, शांत है और बिना किसी बाहरी दखल के सिर्फ दो लोगों के बीच पनपता है। एक ‘ग्रीन-फ्लैग’ लड़का और एक इमोशनल रूप से उलझी लड़की यह कॉम्बिनेशन कहानी को और भी रियल बनाता है।
फिल्म का संगीत कहानी के साथ-साथ चलता है और हर सीन में एक इमोशनल परत जोड़ता है। बैकग्राउंड स्कोर और गानों की सॉफ्टनेस फिल्म को पूरा का पूरा एक के-ड्रामा फील देती है। कुल मिलाकर, ‘दो दीवाने सहर में’ आज की पीढ़ी की भावनाओं से गहराई से जुड़ती है। प्यार को दिखाने का इसका तरीका, इसकी सादगी और इसका सेंसिटिव ट्रीटमेंट इसे वाकई भारत की अपनी के-ड्रामा बना देता है एक ऐसी प्रेम कहानी, जो शोर नहीं करती, बस दिल में उतर जाती है।






