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सियासत-ए-बिहार: जब बस कंडक्टर के सस्पेंशन ने छीन ली CM की कुर्सी, लालू से है सीधा संबंध, यहां पढ़िए सबसे दिलचस्प सियासी किस्सा
एक समय देश के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। बिहार में भी कुछ ऐसा ही था। 1970 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री को सिर्फ इसलिए अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी, क्योंकि एक सरकारी बस कंडक्टर को निलंबित कर दिया गया था
- Written By: अभिषेक सिंह

लालू प्रसाद यादव, नेपथ्य में दारोगा राय (डिजाइन फोटो)
पटना: राजनीति में सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के किस्से जितने संघर्षपूर्ण और रोचक होते हैं। उससे कहीं ज्यादा रोमांचकारी कुर्सी जाने या गंवाने की कहानियां होती हैं। बिहार में चुनावी शंखनाद होने में चंद ही महीनों का वक्त बाकी है। इसलिए सियासत-ए-बिहार सीरीज की आज की किश्त में हम आपके लिए लेकर आए हैं, कुर्सी गंवाने का सबसे दिलचस्प किस्सा।
एक समय देश के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। बिहार में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। 1970 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री को सिर्फ इसलिए अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी, क्योंकि एक सरकारी बस कंडक्टर को निलंबित कर दिया गया था। आप सोच रहे होंगे कि एक साधारण बस कंडक्टर के निलंबन के कारण कोई मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी कैसे गंवा सकता है, वो भी बिहार जैसे बड़े राज्य में, लेकिन ये बात पूरी तरह सच है।
कंडक्टर का सस्पेंशन बना गले की फांस
हम बात कर रहे हैं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय की। जो वर्ष 1970 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। उनके कार्यकाल के दौरान एक सरकारी बस कंडक्टर का निलंबन उनकी सरकार के लिए गले की फांस बन गया और अंततः उनकी सरकार गिरने का मुख्य कारण बना।
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बिहार के पूर्व सीएम दारोगा राय (सोर्स- सोशल मीडिया)
वर्ष 1970 में बिहार राजपथ परिवहन के आदिवासी कंडक्टर को सस्पेंड कर दिया गया था। जिसके बाद निलंबित बस कंडक्टर ने झारखंड पार्टी के दिग्गज आदिवासी नेता बागुन सुम्ब्रुई से गुहार लगाई। बागुन ने बस कंडक्टर के निलंबन के मामले को लेकर मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद से मुलाकात की और उनसे इस फैसले को वापस लेने का आग्रह किया।
सुम्ब्रुई ने किया समर्थन वापसी का ऐलान
इसके बाद करीब एक सप्ताह बीत गया, लेकिन विभाग की ओर से कोई जवाब नहीं आया, जिस पर बागुन ने फिर दारोगा प्रसाद से मुलाकात की और अपनी नाराजगी जाहिर की। बताया जाता है कि इस घटना के बाद बागुन ने सरकार से समर्थन वापस लेने का एलान कर दिया।
विश्वास मत नहीं हासिल कर पाए दारोगा राय
दारोगा प्रसाद को उम्मीद थी कि बागुन के समर्थन वापस लेने के बाद भी वे विश्वास मत हासिल कर लेंगे, लेकिन जब सदन में वोटिंग हुई तो पता चला कि दारोगा प्रसाद विश्वास मत हासिल नहीं कर पाए और उनके पक्ष में सिर्फ 144 विधायक थे। जबकि विपक्ष में 164 विधायक थे। झारखंड से आए बागुन के 11 समर्थकों ने जहां विपक्ष में वोट किया, वहीं वामपंथी दल ने भी सरकार का समर्थन नहीं किया।
कैसे सीएम की कुर्सी तक पहुंचे दारोगा राय?
दारोगा प्रसाद राय ने अपना पहला विधानसभा चुनाव वर्ष 1952 में लड़ा और परसा सीट से चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने। उन्हें यह टिकट बिहार और देश के दिग्गज नेता जगजीवन राम का करीबी होने के कारण मिला था। जगजीवन राम ने ही दारोगा को कांग्रेस में शामिल करवाया था।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय (सोर्स- सोशल मीडिया)
वर्ष 1970 में उन्हें कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार की जिम्मेदारी मिली, लेकिन महज 10 महीने के अंदर ही दरोगा प्रसाद की सरकार गिर गई। इसके बाद अब्दुल गफूर की सरकार में वे उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री रहे, जबकि केदार पांडेय की सरकार में वे कृषि मंत्री थे।
लालू प्रसाद यादव से है सीधा कनेक्शन
लालू यादव का दरोगा प्रसाद राय से सीधा संबंध है। दरअसल, जब देश में मंडल कमीशन का दौर शुरू हुआ तो दरोगा के बेटे चंद्रिका राय लालू के साथ आ गए। जिसके बाद वे 1985 में पहली बार परसा विधानसभा से विधायक बने। वे 2015 से 2017 तक बिहार सरकार में राजपथ मंत्री रहे।
वर्ष 2018 में लालू यादव के बड़े बेटे और बिहार सरकार के पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव ने चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या राय से शादी की थी। हालांकि, यह शादी ज्यादा दिन नहीं चली और शादी के कुछ महीने बाद ही ऐश्वर्या और तेज प्रताप अलग रहने लगे। फिलहाल दोनों के बीच तलाक का मामला कोर्ट में चल रहा है।
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