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यूरोप में तैनात होगी चीनी फौज? ट्रंप के कहर से यूरोपीय देशों को बचाने आगे आया ड्रैगन? क्या है चीन का प्लान
- Written By: अक्षय साहू
US Reduce Troops in Germany: ट्रंप ने ऐलान किया कि वो जल्द ही जर्मनी में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या को कम कर देंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस फैसले ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है।

जर्मनी में सैनिकों की संख्या घटाएगा अमेरिका (कांसेप्ट फोटो, सौ- सोशल मीडिया)
Trump Reduce US Troops in Germany: डोनाल्ड जॉन ट्रंप अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति हैं, जिनके बयान और फैसले तब भी विवादास्पद थे जब वह राष्ट्रपति नहीं थे और आज भी उतने ही विवादों से घिरे हुए हैं, जब वह दुनिया के सबसे ताकतवर देश की सबसे शक्तिशाली कुर्सी पर बैठे हैं। हाल ही में उन्होंने ऐलान किया कि वे उन हजारों अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम करेंगे, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जर्मनी की सुरक्षा में तैनात हैं।
हैरानी की बात यह है कि ट्रंप ने यह फैसला अमेरिका पर किसी त्वरित खतरे को देखते हुए नहीं, बल्कि जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के एक बयान से नाराज होकर लिया। दरअसल, मर्ज ने हाल ही में अमेरिका-ईरान युद्ध को लेकर एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिकी सरकार ईरान से वार्ता नहीं कर पा रही है और ईरानी नेतृत्व अमेरिका का बार-बार मजाक उड़ा रहा है। ट्रंप को मर्ज की ये बात नागवार गुजरी और उन्होंने ऐलान कर दिया कि वो जल्द ही जर्मनी में तैनात अमेरिकी सैनिकों (35- 40 हजार) की संख्या को कम करेंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर अमेरिका, जो बरसों से यूरोप की सुरक्षा का जिम्मा उठा रहा है, वहां से अपना बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी कर रहा है, तो उसकी जगह कौन लेगा? क्या चीन यूरोप में अमेरिका की जगह लेगा, या फिर यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए कोई और इंतजाम करेगा?
ट्रंप और यूरोप के बीच तनाव के कारण
डोनाल्ड ट्रंप और यूरोपीय देशों के बीच तनाव का यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले इस साल कई ऐसे मौके आए, जब अमेरिका और यूरोपीय देश आमने-सामने नजर आए। जनवरी 2025 में ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों सबसे पहले रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अलग-अलग खेमों में खड़े दिखाई दिए। ट्रंप ने जहां इस युद्ध को समय और पैसों की बर्बादी बताया और यूक्रेन पर समझौता कर लेने का दबाव बनाया। वहीं यूरोपीय देशों ने ट्रंप के इस कदम की न सिर्फ आलोचना की, बल्कि यह भी दोहराया कि रूस-यूक्रेन युद्ध यूरोप की सुरक्षा के नजरिए से अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्योंकि इस युद्ध में यूक्रेन के हारने का मतलब रूस की सीधी पहुंच यूरोप तक हो जाना है, जो सुरक्षा के लिहाज से यूरोप के लिए बेहद खतरनाक होगा।
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टैरिफ और ग्रीनलैंड के मुद्दे पर फिर हुआ टकराव
यूरोप और अमेरिका के बीच दूसरा बड़ा टकराव ग्रीनलैंड और टैरिफ के मुद्दे पर देखने को मिला। ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण के बाद ही ऐलान कर दिया था कि वे ग्रीनलैंड को खरीद लेंगे या फिर उस पर कब्जा कर लेंगे।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप से टकराया था यूरोप (कांसेप्ट फोटो, सौ- सोशल मीडिया)
ऐसे समय में डेनमार्क, जिसके पास ग्रीनलैंड की रक्षा की जिम्मेदारी है, ने खुले तौर पर ट्रंप के फैसले का विरोध किया। डेनमार्क ने इसके साथ ही यह भी संदेश दिया कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो उसे करारा जवाब मिलेगा। इस दौरान सबसे बड़ी समस्या यह थी कि डेनमार्क और अमेरिका दोनों ही उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) का हिस्सा हैं।
NATO के टूटने का खतरा बढ़ा
ट्रंप को उम्मीद थी कि यूरोप के बड़े देश जैसे ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और इटली अमेरिका का विरोध नहीं करेंगे। लेकिन इसके उलट इन देशों ने न सिर्फ ट्रंप के फैसले का विरोध किया, बल्कि यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो वे अपनी सेना ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए तैनात करेंगे। बाद में इन देशों ने अपने कुछ सैनिक ग्रीनलैंड भेजे भी। ट्रंप ने इसे अमेरिका के साथ यूरोप की नाफरमानी की तरह देखा और इसकी आलोचना की।
ट्रंप ने यूरोपीय देशों पर लगाया टैरिफ
इसके बाद जब ट्रंप दुनियाभर के देशों पर यह आरोप लगाते हुए टैरिफ लगाने का ऐलान किया कि उन्होंने सालों से अमेरिका की नरमी का फायदा उठाया है, तो इसमें फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन समेत 8 यूरोपीय देशों पर 10% का अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया। इसने एक बार फिर यूरोप और अमेरिका के बीच तनाव पैदा कर दिया। यूरोपीय देशों ने इस फैसले को गलत और एकतरफा बताया। यहां तक कि कुछ देशों ने अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगाने का भी ऐलान किया।
ईरान युद्ध में साफ नजर आई तकरार
टैरिफ और ग्रीनलैंड के मुद्दे के बाद यह साफ नजर आने लगा था कि अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में अब पहले जैसी मधुरता नहीं रही। यह बात तब और स्पष्ट हो गई जब अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर 28 फरवरी 2026 को ईरान पर हमला बोल दिया।
होर्मुज को लेकर यूरोप ने नहीं दिया ट्रंप का साथ (सोर्स- सोशल मीडिया)
जब ईरान ने रणनीतिक रूप से अमेरिका और खाड़ी के बाकी देशों पर दबाव बनाने के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया, तब ट्रंप ने यूरोपीय देशों से इसे खुलवाने के लिए सैन्य कार्रवाई में साथ देने की अपील की। लेकिन सभी देशों ने सैन्य कार्रवाई में शामिल होने से इनकार कर दिया। ट्रंप ने इसे अमेरिका के साथ यूरोपीय देशों की धोखेबाजी करार दिया।
यूरोप का चीन की ओर बढ़ता झुकाव
यही वह समय था जब यूरोपीय देशों का झुकाव अमेरिका से हटकर चीन की ओर और अधिक शुरू हुआ। जनवरी में फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ओर्पो ने बीजिंग की यात्रा की, जहां उन्होंने शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद कई बड़े व्यापारिक समझौते किए।
आठ साल बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने किया चीन का दौरा ( फाइल फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया)
इसके बाद जनवरी में ही ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर चीन दौरे पर पहुंचे। यह किसी भी ब्रिटिश प्रधानमंत्री का आठ साल बाद चीन दौरा था। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य ट्रेड रीसेट, निवेश और रिश्तों में सुधार था। स्टार्मर ने अपने दौरे के दौरान कहा कि चीन दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब है और ब्रिटेन व यूरोप बीजिंग को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
इसके बाद फरवरी में जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने चीन का दौरा किया, जहां उन्होंने कई उच्च-स्तरीय बैठकों में हिस्सा लिया। इन बैठकों को लेकर अमेरिका में असहजता साफ नजर आई।
चीन ने पहले से कर रखी थी तैयारी
ऐसा नहीं है कि यूरोपीय देशों का झुकाव अचानक से चीन की ओर मुड़ा हो, बल्कि चीन ने इसकी तैयारी ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के कुछ समय बाद ही शुरू कर दी थी। इसकी शुरुआत जुलाई 2025 में हुई, जब यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन 25वें यूरोप-चीन शिखर सम्मेलन के लिए चीन पहुंचीं। इस दौरान उनकी मुलाकात शी जिनपिंग समेत चीन के कई बड़े नेताओं से हुई।
चीन के दौरे पर गई थी उर्सुला वॉन डेर लेयेन ( फाइल फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया)
इसके बाद दिसंबर 2025 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों बीजिंग दौरे पर पहुंचे, जहां दोनों के बीच अहम व्यापारिक मुद्दों पर सहमति बनी। इसके बाद एक के बाद एक कई यूरोपीय नेताओं ने चीन के साथ व्यापारिक समझौते किए।
NATO और चीन के बीच बातचीत का नया दौर
इस दौरान एक और दिलचस्प चीज हुई NATO और चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के बीच सालों बाद बातचीत शुरू हुई। यह बातचीत ऐसे समय में हो रही थी, जब अमेरिका और NATO के रिश्तों में खटास नजर आ रही थी और ट्रंप लगातार बयान दे रहे थे कि वे अमेरिका को जल्द ही NATO से अलग कर सकते हैं।
इसके बाद यह सवाल उठने लगा कि क्या चीन उस संगठन से करीबी बढ़ाएगा, जिसे उसने सालों से अपने प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा है। और जब ट्रंप यूरोप से अपने सैनिकों को वापस लाने की बात कर रहे हैं, तो क्या चीन यूरोप में अमेरिका की जगह ले सकता है?
अमेरिका की जगह लेना चीन के लिए कितना मुश्किल?
चीन और यूरोप सालों से दो अलग ध्रुवों की तरह काम करते आए हैं। दोनों के बीच कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर मतभेद साफ हैं। सबसे बड़ा मुद्दा रूस-यूक्रेन युद्ध है, जो यूरोप के लिए अस्तित्व और सुरक्षा का सवाल है। यूरोप किसी भी हाल में इस युद्ध में रूस को विजेता के रूप में नहीं देखना चाहता।
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वहीं, चीन ने इस युद्ध में सीधे तौर पर किसी का पक्ष नहीं लिया और बातचीत के जरिए शांति स्थापित करने की अपील करता रहा है, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि वह इस युद्ध में रूस के साथ खड़ा रहा है। तो क्या ऐसे में यूरोप का भरोसा चीन पर बन पाएगा? यह एक अहम और बड़ा सवाल है, जिसका जवाब पूरी दुनिया जानना चाहती है।
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