Russia Iran की दोस्ती में कहां फंसा पेंच? रक्षा समझौते के बाद भी सैन्य मदद न मिलने की क्या है असली वजह

Russia Iran Military Help: रूस और ईरान के बीच व्यापक रणनीतिक समझौते के बावजूद रूस ईरान की सैन्य मदद नहीं कर रहा है। इसके मुख्य कारण यूक्रेन युद्ध और खाड़ी देशों से रूस के अच्छे संबंध हैं।
Russia Iran: Why Russia Is Not Helping Iran Militarily Against US And Israel Despite Treaty
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची (सोर्स-सोशल मीडिया)
Published on
Updated on

Russia Iran Military Help Against US And Israel: रूस और ईरान के बीच हाल ही में एक बड़ी व्यापक रणनीतिक साझेदारी संधि हुई है। इस महत्वपूर्ण समझौते पर 17 जनवरी 2025 को हस्ताक्षर किए गए थे। यह अहम संधि 2 अक्टूबर को अमल में आई है और पूरे 20 सालों के लिए की गई है। यह विशेष संधि दोनों देशों के बीच रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा सहयोग को काफी गहरा करती है।

इस बड़े समझौते में नाटो की तरह सीधे तौर पर सैन्य मदद करने की कोई भी बाध्यता शामिल नहीं है। हालांकि इसमें यह पूरी तरह स्पष्ट है कि दोनों देश किसी भी दुश्मन देश का साथ बिल्कुल नहीं देंगे। दोनों देश मिलकर कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का मुकाबला करने और परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में साझेदारी के लिए सहमत हैं। रूस की तरफ से कोई प्रत्यक्ष सैन्य मदद नहीं मिलने के बाद भी ईरान की सरकार रूस से बहुत खुश है।

रूस पर यूक्रेन युद्ध का भारी दबाव

रूस ने ईरान की सैन्य मदद न करने का सबसे बड़ा कारण यूक्रेन के साथ चल रहा उसका लंबा युद्ध है। रूस खुद इस भयानक लड़ाई में फंसा हुआ है और वह कोई नया बड़ा अंतरराष्ट्रीय जोखिम नहीं लेना चाहता। रूस बिल्कुल नहीं चाहता कि यूक्रेन मामले को लेकर उस पर कोई भी नया वैश्विक दबाव और अधिक बढ़े। प्रत्यक्ष सैन्य में मदद न देने के बावजूद रूस ईरान को कभी भी पूरी तरह से बर्बाद नहीं होने देना चाहता। रूस खुलकर कह रहा है कि ईरान पर अमेरिका और इजराइल का हालिया हमला पूरी तरह से गलत कदम है। उसने ईरान को पूरा भरोसा दिया है कि नए कड़े प्रतिबंध लगने पर भी वह उसका साथ कभी नहीं छोड़ेगा।

खाड़ी देशों के साथ रूस के अच्छे रिश्ते

सैन्य मदद न करने का दूसरा सबसे अहम कारण संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से रूस के मजबूत रिश्ते हैं। रूस किसी भी कीमत पर इन प्रमुख खाड़ी देशों के साथ अपने अच्छे और पुराने संबंधों को नहीं बिगाड़ना चाहता। हालांकि रूस की यह कूटनीतिक स्थिति ईरान के लिए भी भविष्य में काफी ज्यादा फायदेमंद ही साबित हो रही है। ईरान अब रूस के माध्यम से सभी प्रमुख खाड़ी देशों तक अपनी बात बहुत ही आसानी से सीधे पहुंचा सकता है। अगर रूस सीधे इस युद्ध में शामिल होता तो पूरा यूरोप निश्चित रूप से अमेरिका के साथ मजबूती से खड़ा हो जाता। फिलहाल यूरोप ने ईरान के प्रति नरम रुख अपनाया है जिससे अमेरिका की कूटनीति बिल्कुल भी सफल नहीं हो पा रही है।

डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्रा में व्यापार

इस विशेष समझौते में डॉलर के बजाय अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने पर भी पूरी सहमति बन गई है। दोनों देश अब रूस की मुद्रा रूबल और ईरान की मुद्रा रियल में अपने आपसी व्यापार को तेजी से आगे बढ़ाएंगे। यह आर्थिक कदम दोनों देशों को पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों से बचने में एक बहुत ही बड़ी मदद करेगा।

संयुक्त राष्ट्र में ईरान का मजबूत पक्ष

ईरान और रूस का यह नया समझौता दोनों देशों पर लगे कड़े प्रतिबंधों का मिलकर डटकर विरोध करता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी ईरान के पक्ष में चीन से भी ज्यादा रूस बहुत खुलकर साथ दे सकता है। यही वह मुख्य कारण है कि सीधे तौर पर सैन्य मदद नहीं मिलने पर भी तेहरान रूस के कूटनीतिक रूख से खुश है।

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com