
ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में पाकिस्तान की एंट्री, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Pakistan Entry Trump Board of Peace: स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपने महत्वाकांक्षी ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को लॉन्च करते ही पाकिस्तान में एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है।
इस अंतरराष्ट्रीय निकाय में शामिल होने के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के फैसले ने देश के भीतर तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है। आलोचक और विशेषज्ञ इस कदम को सिद्धांतों की बलि चढ़ाने और ट्रंप की ‘चापलूसी’ के रूप में देख रहे हैं।
पाकिस्तान में इस फैसले के विरोध में स्वर बहुत कड़े हैं। पूर्व राजनयिकों और बुद्धिजीवियों ने शहबाज शरीफ सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए उन्हें ट्रंप का चाटुकार तक कह दिया है। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने इस बोर्ड की विश्वसनीयता पर ही बड़े सवाल उठाए हैं।
लोधी का तर्क है कि यह पहल पूरी तरह से ट्रंप के व्यक्तित्व से जुड़ी है और उनके राष्ट्रपति पद का कार्यकाल समाप्त होते ही इसके टिके रहने की संभावना कम है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ट्रंप को खुश करना देश के सिद्धांतों से ऊपर हो गया है?
इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू इजरायल की मौजूदगी है। पाकिस्तान ने अब तक आधिकारिक तौर पर इजरायल को मान्यता नहीं दी है लेकिन वह अब उस बोर्ड का हिस्सा बन गया है जिसमें इजरायल पहले से शामिल है।
पूर्व कानून मंत्री बाबर अवान ने इसे शरीफ सरकार की फिलिस्तीन के प्रति गद्दारी करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सिर्फ ट्रंप को खुश करने के लिए पाकिस्तान उन लोगों के साथ बैठने को तैयार हो गया है जिन्हें युद्ध अपराधों के लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए। अवान ने इसे एक ऐतिहासिक भूल बताया है।
पाकिस्तान के भीतर से यह भी आवाज उठ रही है कि इतना बड़ा अंतरराष्ट्रीय फैसला बिना किसी सार्वजनिक बहस या संसद की मंजूरी के लिया गया है। पूर्व सीनेटर और वकील मुस्तफा नवाज खोखर ने इस फैसले को अमान्य बताया है क्योंकि इसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
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वहीं, पत्रकार बकीर सज्जाद ने इसे मुस्लिम जगत की “राजनीतिक पाखंड” का सबसे बड़ा उदाहरण बताया है, जहाँ फिलिस्तीनियों के हक की बात करने वाले देश अब ट्रंप की चापलूसी में जुटे हैं।
गौरतलब है कि ट्रंप ने इस बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र के विकल्प या उसकी जगह लेने वाले चार्टर की तरह पेश किया है। हालांकि, लॉन्चिंग के वक्त उन्होंने यह भी कहा कि बोर्ड गठित होने के बाद वे संयुक्त राष्ट्र के साथ तालमेल बिठाकर काम करेंगे। पाकिस्तान जैसे मुल्क का ऐसे संगठन में शामिल होना, जो वैश्विक संस्थाओं की प्रासंगिकता को चुनौती दे रहा है देश की विदेश नीति पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।






