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मायावती की तरह ‘एकला चलो’ की राह पर चन्द्रशेखर आजाद ‘रावण’, मिलेगा फायदा या होगा नुकसान?
एक ताजा इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि वह किसी भी पार्टी के पीछे भेड़चाल नहीं चलेंगे, बल्कि अपने एजेंडे के साथ अकेले खड़े रहेंगे।
- Written By: अभिषेक सिंह

चंद्रशेखर आजाद 'रावण' (डिजाइन फोटो)
लखनऊ: लोकसभा चुनाव 2024 में नगीना सीट से जीत दर्ज करने के बाद आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ के हौंसले सातवें आसमान पर हैं। एक ताजा इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि वह किसी भी पार्टी के पीछे भेड़चाल नहीं चलेंगे, बल्कि अपने एजेंडे के साथ अकेले खड़े रहेंगे। चन्द्रशेखर के इस बयान के बाद सूबे के सियासी गलियारों में माहौल गर्माया हुआ है।
लोकसभा चुनाव 2024 में बसपा जैसी बड़ी पार्टी एक सीट नहीं हासिल कर सकी। वहीं, आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष ने नगीना से चुनाव लड़कर जीत दर्ज की। इस जीत के बाद से चंन्द्रशेखर आजाद के हौसले बढ़े हुए हैं। इन बढ़े हुए हौसलों का असर सदन सदन में स्पीकर चुनाव के लिए वोटिंग के दौरान भी दिखा। तब चन्द्रशेखर करीब-करीब सभी विपक्षी दलों के सांसद सदन सो वॉक आउट कर गए थे लेकिन चन्द्रशेखर वहीं जमे रहे। अब इस बात पर उन्होंने चुप्पी तोड़ी है।
सदन से क्यों नहीं किया वॉकआउट
सदन से वॉकआउट न करने को लेकर चन्द्रशेखर रावण ने समाचार माध्यम इंडियन एक्सप्रेस के एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि वह न तो दक्षिणपंथी रहेंगे ने ही वामपंथी। बहुजन के नेता हैं और अपने एजेंडे के साथ खड़े रहेंगे। इसीलिए उन्होंने विपक्ष के साथ वॉकआउट नहीं किया। उन्होंने आगे कहा कि वह भेड़ नहीं हैं जो किसी के पीछे चलें, बल्कि अपने लाखों लोगों की उम्मीद हैं।
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क्या कहते हैं राजनीतिक जानकार
सियासी पंडित चन्द्रशेखर आजाद ‘रावण’ के इस बयान पर दो धड़ों में बंटे हुए हैं। एक धड़ा इसे लोकसभा चुनाव की परिस्थितियों से जोड़कर देख रहा है तो वहीं दूसरा धड़ा इसे अति आत्मविश्वास करार दे रहा है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चन्द्रशेखर विपक्षी खेमे से नाराज हैं। क्योंकि यूपी में पहले चर्चा थी कि आजाद समाज पार्टी कांशीराम विपक्षी गठजोड़ का हिस्सा होगी। ऐसा नहीं हुआ। फिर चर्चा चली कि सपा और कांग्रेस की तरफ से नगीना में प्रत्याशी नहीं उतारा जाएगा पर सपा ने यहां प्रत्याशी उतारकर चन्द्रशेखर रावण को झटका दे दिया। हालांकि वह जीत दर्ज करने में कामयाब रहे लेकिन इसकी टीस उनके मन में बाकी है।
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दूसरी तरफ राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि चन्द्रशेखर ने विपक्ष के साथ इसलिए नहीं हैं उनका वह अति आत्मविश्वास में हैं। बीजेपी और विपक्ष दोनों ही तरफ से उम्मीदवार उतारे जाने के बावजूद नगीना में जीत हासिल करना कोई मामूली बात नहीं है। ऐसी सफलता पर किसी के हौसले भी बुलंद हो सकते हैं।
चंद्रशेखर के निर्णय से नफा या नुकसान?
बात करें चंद्रशेखर के इस निर्णय से होने वाले नफ़ा नुकसान की तो इससे नुकसान होने के चांसेस 50-50 हैं। बसपा जैसी बड़ी पार्टी ने इस लोकसभा चुनाव में अकेले चलने का फैसला किया हालत क्या हुई सबको पता है। इसके अलावा चन्द्रशेखर और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) अभी सियासत के शुरुआती दौर में हैं। ऐसे में अगर वह किसी खेमें के साथ जुड़ते हैं तो जनाधार बढ़ाने में आसानी होगी।
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दूसरी तरफ चंद्रशेखर के इस डिसीजन से फायदा यह दिख रहा है कि वह बहुजन के नए नेता के तौर पर उभरकर सामने आए हैं ऐसे में उम्मीद है कि बहुजनों का वोटबैंक बसपा से आसपा(कां) की तरफ शिफ्ट हो जाए। अब देखना अहम है कि आने वाले दिनों में इसका क्या कुछ असर दिखाई देता है।
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