
मां की संपत्ति पर किसका होता है कानूनी हक? (सोर्स-सोशल मीडिया)
Hindu Succession Act Section 15 Rules: मां की संपत्ति का बंटवारा भारत में एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण कानूनी विषय है जिसके बारे में जागरूकता की कमी देखी जाती है। पिता की संपत्ति के नियमों से उलट, माता की संपत्ति पर उत्तराधिकार के नियम पूरी तरह से अलग और स्पष्ट हैं। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत मां की स्वयं अर्जित और विरासत में मिली संपत्तियों के लिए अलग-अलग प्रावधान सुनिश्चित किए गए हैं। इन नियमों को समझना न केवल विवादों को टालने के लिए जरूरी है, बल्कि यह बेटियों और पिताओं के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है।
भारतीय कानून के अनुसार मां की संपत्ति पर हक इस बात से तय होता है कि वह संपत्ति ‘स्व-अर्जित’ है या उन्हें ‘विरासत’ में मिली है। अगर मां ने अपने संसाधनों से संपत्ति खरीदी है या उन्हें उपहार में मिली है, तो वह उसकी पूर्ण स्वामिनी मानी जाती हैं। स्व-अर्जित संपत्ति के मामले में मां को यह पूरा अधिकार है कि वह अपनी मर्जी से किसी को भी वसीयत कर सकें।
अगर मां ने अपनी संपत्ति की कोई वसीयत (Will) नहीं बनाई है, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के तहत बंटवारा किया जाता है। ऐसी स्थिति में पहला अधिकार मां के बच्चों (बेटे और बेटियों) और पति का होता है, जिनमें संपत्ति समान रूप से बांटी जाती है। अगर किसी बच्चे की पहले ही मृत्यु हो चुकी है, तो उस हिस्से पर उस मृतक बच्चे की संतानों का कानूनी दावा माना जाता है।
प्राथमिक वारिसों (पति और बच्चों) की अनुपस्थिति में संपत्ति पर हक का क्रम कानून द्वारा कड़ाई से निर्धारित किया गया है। दूसरे चरण में संपत्ति पति के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित की जाती है और यदि वे भी उपलब्ध नहीं हैं, तो माता-पिता को हक मिलता है। इसके बाद क्रमशः पिता के उत्तराधिकारियों और अंत में माता के मायके के उत्तराधिकारियों को संपत्ति देने का कानूनी प्रावधान किया गया है।
समाज में व्याप्त इस धारणा के विपरीत कि विवाहित बेटी का हक खत्म हो जाता है, कानून बेटियों को बेटों के बराबर दर्जा देता है। चाहे बेटी विवाहित हो, अविवाहित हो या विधवा, मां की संपत्ति पर उसका दावा हमेशा बरकरार रहता है। यहां तक कि मां को अपने मायके से मिली संपत्ति में भी बेटी का उतना ही हिस्सा होता है जितना कि परिवार के अन्य पुरुष सदस्यों का।
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विरासत में मिली संपत्ति के मामले में कानून काफी अलग तरीके से काम करता है और यह संपत्ति के स्रोत पर निर्भर करता है। अगर मां को संपत्ति उनके पति या ससुर से मिली थी और वे बिना वसीयत मर जाती हैं, तो वह संपत्ति वापस पति के वारिसों को जाती है। वहीं अगर संपत्ति मायके से मिली थी, तो संतान न होने की स्थिति में वह संपत्ति उनके पिता के उत्तराधिकारियों को वापस मिल जाती है।
Ans: हां, अगर संपत्ति मां ने स्वयं कमाई है, तो वह वसीयत के माध्यम से इसे किसी भी एक बच्चे या बाहरी व्यक्ति को देने के लिए स्वतंत्र हैं।
Ans: ऐसी स्थिति में संपत्ति सबसे पहले उनके बच्चों (बेटे और बेटियों) और उनके पति में बराबर-बराबर बांटी जाती है।
Ans: हां, कानूनन विवाहित होने से अधिकार खत्म नहीं होता, बेटी का हक बेटे के बराबर होता है, चाहे वह विवाहित हो या विधवा।
Ans: अगर उनकी अपनी संतानें नहीं हैं, तो मायके से मिली संपत्ति उनके पिता के उत्तराधिकारियों (भाई-बहनों आदि) को वापस मिल जाती है।
Ans: आम तौर पर सौतेले बच्चों का सौतेली मां की संपत्ति पर सीधा अधिकार नहीं होता, जब तक कि वसीयत में उनका नाम न हो या पति के उत्तराधिकारी के रूप में उनका क्रम न आए।






