नवभारत विशेष: डराती है कुदरत के कहर की नई चेतावनी

Cloudburst Risk: नंदा राजजात यात्रा पर पुनर्विचार का कारण केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि हिमालय में बढ़ती आपदाओं और बेमौसम आग ने खतरे की घंटी बजा दी है।
Navbharat Special: The new warning of nature's fury is frightening.
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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नवभारत डिजिटल डेस्क: देवाल, थराली एवं नंदानगर में प्रभावित स्थानों पर पुननिर्माण कार्य अभी अधूरे हैं, पूरी राजजात यात्रा के पड़ावों पर अभी ढांचागत विकास के कार्य होने हैं। तीसरी बात है कि प्रशासन ने यात्रा समिति से यात्रा के पुनरि पुनर्विचार के लिए लिखा जिसपर समिति ने यह निर्णय लिया है। नंदा राजजात यात्रा वर्ष 1843 से आरंभ हुई और अब तक दस बार हो चुकी है।

कुदरत का कहर और कब उसका प्रकोप हो जाए इससे शासन- प्रशासन डरा हुआ है। ऐसे में चमोली जिले में यूनेस्को की धरोहर फूलों की घाटी एक हफ्ते तक सुलगती रही जब वह काबू में आई तो ज्योतिर्मठ के पास चांई के जंगलों में आग लग गई। इन दो मामलों से साफ हो गया है कि कुदरत ने अलार्म बजा दिया है, वह चीख चीखकर कह रही है कि आपदा किसी विकराल रूप में आने वाली है। संभल जाओ।

व्यवस्थाएं कितनी लाचार हैं इसका प्रमाण देखिए- मुख्यमंत्री ने इस यात्रा को लोक उत्सव के रूप में मनाने का ऐलान करीब 6 माह पहले ही कर दिया था तथा कोई दो वर्ष से अधिक से इसकी तैयारियां विभिन्न वर्गों द्वारा की जा रही थी।

2027 में जब यह यात्रा होगी तब क्या गारंटी है कि बादल नहीं फटेंगे, यात्रा मार्गों पर व्यवस्थाएं पूरी तरह से हादसा प्रूफ हो जाएंगी या फिर हजारों लोगों की आस्था यात्रा में कोई व्यवधान नहीं आएगा। देश इस वक्त मौसम की रंग बदलती नीतियों से त्रस्त है।

पहाड़ अपनी रौनक खो चुके हैं। पहाड़ों पर बर्फ के दर्शन नहीं हो रहे। सर्दी का सीजन बीत चुका है और बारिश जिसे मावठ भी कहते हैं कहीं हुई ही नहीं है, हालत इतनी खराब है कि ओम पर्वत जो बर्फ के कारण ही अपनी शिवशक्ति का प्रतीक बन चुका है वह काला नजर आ रहा है।

हिमस्खलन, बादल फटने का जोखिम

हिमालय के महाकुंभ के नाम से विश्व में जानी जाने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा एक साल के लिए स्थगित हो गई है। इसके पीछे तीन कारण बताए जा रहे हैं। एक यह कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हिमस्खलन, प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम, बर्फ की बहुतायत होने की संभावना तथा अभी तक यात्रा के लिए व्यवस्थाएं पूरी तरह से नहीं हो पाने के कारण इसे स्थगित किया गया है। दूसरा कारण यह भी कहा जा रहा है कि वर्ष 2025 में उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएं अधिक हुई हैं।

पहाड़ों का फायर सीजन अब बेमौसम सीजन बन चुका है। इस वर्ष यह अपने तय समय से दो महीने पहले ही आ गया। नतीजा यह हुआ है कि यूनेस्को की धरोहर फूलों की घाटी में आग लगी हुई है, पिथौरागढ़ के पंचाचूली और छिपलाकोट के बुग्यालों में उस समय आग लग गई जब पहाड़ बर्फ और ठंड से कांपते हैं। कितना हास्यास्पद है कि जिस यात्रा के लिए वर्षों से तैयारियां-बैठकें चल रही थीं उसे व्यवस्थाओं के पूरी नहीं होने के कारण स्थगित करना पड़ा।

नंदा राजजात यात्रा उत्तराखंड की सबसे दुर्गम, पवित्र और पुरानी यात्रा है। 280 किलोमीटर लंबी यात्रा में आगे-आगे चलने वाला चौसिंग्या खाडु जो मां का दूत है, वह यदि उपलब्ध न हो तो यात्रा को टाला जाता है। यह बताता है कि कुदरत की चेतावनी आ चुकी है। न बर्फ, न बारिश, गर्मी और जंगलों में समय से पहले की आग कह रहे हैं कि यात्रा या धर्म के नाम पर जो पर्यटन की आपाधापी है अगर उसे नहीं रोका गया तो परिणाम धार्मिक यात्राओं के स्थगन जैसे ही होंगे।

शायद पर्यटकों की यही भीड़ है जिसकी जहरीली हवा फेंकती गाड़ियां, प्लास्टिक की फेंकी गई बोतलें, रैपर, नैपकीन, डायपर्स, शराब की बोतलें, पेट्रोलियम पदार्थों का प्रदूषण जहर पूरे भारत के पर्यावरण को हिलाकर रख गया।

एक अनुमान के अनुसार 1 जनवरी को कम से कम दो करोड़ लोगों ने पर्यटन किया उन्होंने पर्यावरण को कितना दूषित किया इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। यही कारण है कि जंगलों में सर्दियों में पत्तियां सूखी हैं और वह आग लगने का कारण बन रही हैं।

लेख-मनोज वाष्णेय के द्वारा

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