
निर्विरोध निर्वाचन (सौ.डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: इसके कितने ही लोग चुनाव प्रणाली का मखौल मानेंगे कि राज्य की 29 महानगर पालिकाओं के लिए होनेवाली वोटिंग से पहले ही बीजेपी और शिवसेना (शिंदे) के 68 नगरसेवक निर्विरोध निर्वाचित हो गए। कल्याण-डोंबिवली के सर्वाधिक 20 तथा ठाणे, पुणे, पिंपरी-चिंचवड से लेकर धुले-जलगांव तक कितने ही नगरसेवकों को चुनाव लड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ी बल्कि उनकी जीत का जश्न मनाते हुए गुलाल उड़ाया गया। महाराष्ट्र में बीजेपी के सर्वाधिक 44 नगरसेवक निर्विरोध चुने गए। ऐसा ही एकनाथ शिंदे व अजीत पवार की पार्टियों के साथ भी हुआ। यह निर्विरोध निर्वाचन वाला चमत्कार क्यों हुआ? विरोधी प्रत्याशियों पर नाम वापस लेने का दबाव डाला गया या उन्हें प्रलोभन दिया गया।
सोलापुर में तो ऐसे दबाव के चलते खून भी हो गया। इन आरोपों की चुनाव आयोग जांच करेगा लेकिन इसके पहले चुनाव मशीनरी ने क्या किया? जनता मानती है कि चुनाव प्रक्रिया दिन-ब-दिन भरोसा खोती चली जा रही है। दलील है कि नोटा का प्रावधान होने से निर्विरोध निर्वाचन अवैध माना जाता है लेकिन जब मत डाले ही नहीं गए तो नोटा का सवाल ही नहीं उठता। सत्ताधीशों ने साम, दाम, दंड, भेद का इस्तेमाल किया और अनेक विरोधियों ने बिना लड़े ही शस्त्र त्याग दिए। यूं तो पहले यह दिखाया गया कि सीटों पर दावे को लेकर महाविकास आघाड़ी में खींचतान चल रही है लेकिन फिर पता चला कि यह मैच फिक्सिंग थी। शिवसेना (उद्धव) तथा मनसे का आरोप है विरोधी उम्मीदवार को नाम वापसी के लिए करोड़ रुपए का लालच दिया गया।
चुनाव अधिकारी से मिलीभगत कर विरोध प्रत्याशी के नामांकन रद्द किए गए। कुछ को नामांकन दाखिल करने पहुंचने नहीं दिया गया। कुछ पर गुंडों व पुलिस के जरिए दबाव डाले जाने की शिकायतें हैं। विपक्ष का अस्तित्व खत्म करने की डींग हांकी गई। चुनाव के पहले अचानक नाम वापस लेनेवालों में शिवसेना (उद्धव), मनसे, कांग्रेस, राकांपा (शरद पवार) तथा वंचित बहुजन आघाड़ी के उम्मीदवार हैं। स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि किसी पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार ऐन मौके पर नाम कैसे वापस ले सकता है? क्या वह खुद पर पड़ रहे दबाव या दिए जा रहे प्रलोभन की शिकायत अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से नहीं कर सकता था? ऐसे नाम वापस लेनेवाले धोखेबाजों पर पार्टी को कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।
ये भी पढ़ें- ‘नवभारत विशेष’ की अन्य रोचक ख़बरों और लेखों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
एक बार ठाणे में 3 मत फुट जाने पर नाराज होकर शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सभी नगरसेवकों से इस्तीफा ले लिया था। क्या पार्टियों की आपस की सेटिंग की वजह से ऐसा हुआ? क्या पार्टियों ने अपने ही कार्यकर्ताओं की बलि दी? यह सब जांच का विषय है। लोकतंत्र की रक्षा करना है तो चुनाव अनिवार्य होना चाहिए।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा






