महाराष्ट्र सरकार ने दिया 10 घंटे काम करने का प्रस्ताव (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: टैरिफ युद्ध की वजह से राष्ट्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। इस माहौल में सिर्फ व्यापार संबंधी नीति से काम नहीं चलेगा, बल्कि उत्पादन वृद्धि भी करनी होगी। इसके लिए आर्थिक सुधारों को गति देनी होगी जिसके तहत श्रम कानूनों में संशोधन करना आवश्यक है। निजी उद्योगों, संस्थाओं, दुकानों, होटलों आदि में श्रमिकों के काम का समय 9 से बढ़ाकर 10 घंटे किए जाने का प्रस्ताव राज्य सरकार ने केंद्र के पास मंजूरी के लिए भेजा है। राज्य सरकार द्वारा तैयार की गई संहिता केंद्रीय श्रम कानून के अनुरूप है जिसमें महिला श्रमिकों के काम के घंटे और उनकी सुरक्षा का भी विचार किया गया है।
श्रमिकों की निवास व्यवस्था, निवासों की संख्या, उनका देखभाल व मरम्मत, श्रमिकों के बच्चों की शैक्षणिक व स्वास्थ्य सुविधा पर भी प्रारूप में विचार का दावा किया गया है। राज्य में उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने, निवेश बढ़ाकर रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने का उद्देश्य इसके पीछे है। पुराने श्रम कानून इसमें कहीं न कहीं बाधक बन रहे हैं। नए प्रारूप के अनुसार निरंतर काम करने की अवधि 5 घंटे से बढ़ाकर 6 घंटे करने तथा कुल कार्य दिवस 10 घंटे करने का प्रस्ताव है। यदि 10 घंटे से ज्यादा काम लिया जाता है तो ओवरटाइम देना होगा। इसके पीछे उत्पादकता बढ़ाने की मंशा है।
इसके साथ ही श्रमिक के स्वास्थ्य, पारिवारिक व सामाजिक प्रभाव पर भी विचार करना होगा। 3 माह की समयावधि में ओवरटाइम 148 घंटों से अधिक नहीं होना चाहिए। श्रमिकों को अन्य रियायतें व सुविधाएं देने का भी प्रावधान होना चाहिए। महाराष्ट्र देश का प्रगतिशील औद्योगिक राज्य है इसलिए उत्पादन वृद्धि कर अर्थव्यवस्था को बल प्रदान करने का विचार इस प्रस्ताव के पीछे है लेकिन यह भी विचार करना होगा कि श्रमिक कल्याण के लिए अब तक जो भी कानून बनाए गए, उन्हें किस हद तक लागू किया गया? श्रमिक काम करने को तैयार रहते हैं लेकिन उनके हित में बने कानूनों को भी उसी तत्परता से लागू किया जाना चाहिए।
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निजी क्षेत्र के कर्मचारी असंगठित हैं। उनके परिश्रम और जोखिम को देखते हुए क्या उन्हें उचित पारिश्रमिक दिया जाता है? इस समय देश में मजदूर वर्ग संगठित व असंगठित क्षेत्रों में बंटा हुआ है। संगठित क्षेत्र तो आंदोलन करके अपनी मांगें मनवा लेता है लेकिन दूसरी ओर ठेके पर या अंशकालिक काम करनेवाले श्रमिक भी हैं। गिग वर्कर की नई जमात सामने आई है जिनकी स्थिति दयनीय कही जा सकती है। उन्हें कौन सा सुरक्षा कवच दिया जा रहा है? यह मुद्दा भी विचारणीय है कि यदि निजी क्षेत्र में 10 घंटे काम लेने का प्रस्ताव है तो सरकारी व अर्धसरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए भी ऐसा प्रावधान क्यों नहीं होना चाहिए? जिन क्षेत्रों में छुट्टियों की तादाद काफी अधिक है उनके बारे में क्या सोचा गया है? क्या कॉलेज का प्रोफेसर या शालेय अध्यापक 10 घंटे पढ़ाएगा? यह संभव नहीं लगता। काम के घंटे के साथ ही गुणवत्ता को भी जोड़ना होगा। ऐसे तमाम पहलुओं पर विचार किया जाना उपयुक्त रहेगा।
लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा